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कौनसा अर्थ सही "कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर" या "तेरा कर्म पर ही अधिकार है फल पर नहीं"?

"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना लेकिन आतंकी अल्लाह हु अकबर बोल के मासूमो को मारते है, इसका मतलब ये ही है की शब्दार्थ गलत समझाया जाता है. गीता के साथ भी ऐसा "
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"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखा ये तो हम बचपन से सुनते आये है लेकिन "अल्लाह हु अकबर..." बोलते हुए आतंकी जब मासूमो को मारता चला जाता है तो इस बात पे सवाल उठते जरूर है. हालाँकि सेकुलरिज्म के नाम पर इस विषय को जहर बना दिया गया है और कोई चर्चा नहीं होती है जिसकी वजह से ये समस्या जटिल होती जाती है.

हक़ीक़त ये ही है की कोई पंथ हिंसा नहीं सिखाता है लेकिन आत्मरक्षा जरूर सिखाता है, पर धार्मिक पुस्तके जो होती है वो पुरानी भाषाओ में होती है. पहले धर्म में राजनीती नहीं होती थी तो भगवान् से डरते हुए कंही गलत अर्थ न पढ़ा दे ये मान कर इन धार्मिक ग्रंथो के शब्दार्थ पढ़ाये जाते थे.

लेकिन कलियुग में किसी को कोई डर नहीं है और धर्म में राजनीती घुसा दी गई है, इसलिए अपनी सहूलियत के हिसाब से धर्म गुरु धार्मिक ग्रंथो का गलत अर्थ समझाते है. इसी गलत पढ़ाई से धर्म को न समझकर इंसान जानवर बन जाते है और ऊपर वाले के नाम पर ही हिंसा फैलाते है.

गीता के श्लोको के साथ भी ऐसा ही किया है सेक्युलर हिन्दुओ ने, इसलिए जाने पहुचर्चित शलोको का सही अर्थ...


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"क्या लेकर आया था क्या लेकर जायेगा, तेरा क्या था जो तूने खो दिया...." ये गीता को संदर्थ करके ज्ञान आपको हर पंसारी की दूकान में लिखा मिलेगा लेकिन ये गीता में लिखा ही नहीं है और मन गढंत लिखा है. ऐसे ही गीता के मुख्य श्लोक कर्मण्ये वाधिकारस्ते.....का भी गलत अर्थ समझाया गया है सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचो पर.

"कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर...." ये अर्थ बहु प्रचलित है ऊपर बताये गए श्लोक का जो की सरासर गलत है. इस अर्थ पर चलेंगे तो आप बिना सोचे कर्म करेंगे फल की बिना सोचे जिससे आप पापी ही बनेंगे. 

इसका असली अर्थ है की "तेरा कर्म करने पर ही अधिकार है फल पर नहीं" यानी कर्म क्या करना है वो तेरे हाथ में है लेकिन फल क्या मिलेगा ये तू तय न ही कर सकता है इसलिए तो फल की सोच कर कोई सत्कर्म मत कर. निष्कर्मी यानि कुछ न करे आइए भी मत हो बल्कि करने योग्य कर्म ही बिना फल की इच्छा के कर.

यानी जो अच्छे कर्म है वो ही कर लेकिन बिना फल की इच्छा के क्योंकि फल की इच्छा करने किये जाने वाले कर्म अत्यंत निंदनीय है.
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