क्या जानते है आखिर क्या है गंगा जमुनी तहजीब? जाने इसका महत्त्व और फलसफा

"टीवी पर मीडिया में या अखबारों की सुर्खियों में आप हमेशा गंगा जमुनी तहजीब के कुछ किस्से पढ़ते रहते होंगे जिसमे हिन्दू और मुस्लिम पक्ष की कोई खबर होती है लेकिन...."

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गंगा जमुनी तहजीब मूलतः एक उर्दू उपयोग में आने वाला शब्द है जो की गंगा और यमुना नदी के किनारे बसे हिन्दू और मुस्लिमो के लिए प्रयुक्त होता है. बाबर और औरंगजेब युग के अंत के बाद अवध क्षेत्र में इस शब्द या संस्कृति की शुरुवात हुई थी जो की भारत की संस्कृति का केंद्र है. 

प्रयाग, लखनपुर, कानपूर, अयोध्या और बनारस इसका केंद्र है जमुना किनारे होने से दिल्ली भी इसी में आता है और इन्ही से इसकी शुरुवात हुई थी. हालाँकि 1724 से अवध की निजाम शादम खान जो की पारसी मूल से थे ने इसकी शुरुवात करवाई थी और सौहार्द स्थापित किया था.

इसी तहजीब से ही क़वाली का जन्म हुआ था जिसमे दोनों संस्कृतियों का प्रभाव है और दिल्ली समेत कई संगीत घराने इसी के चलते पनपे थे. हालाँकि देखा जाए तो गंगा और जमुना दोनों ही हिन्दुओ की पवित्र नदिया है और इनके प्रति मुस्लिमो की कोई आस्था नहीं है लेकिन फिर भी इनके नामो का प्रयोग क्यों जाने?


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गंगा जमुनी तहजीब में नदियों के नाम का इस्तेमाल केवल इलाको में रिहाइश के आधार पर ही किया गया है आस्था के आधार पर नहीं. इस तहजीब का सीधा सीधा अर्थ लगाया जाता है की की हिन्दू मुस्लिम की और मुस्लिम हिन्दू धर्म की आस्था मान्यताओं का सम्मान करे.

दोनों को ही न तो आपत्ति हो एक दूसरे के धर्म और मान्यताओं से और न ही एक दूसरे की मान्यताओं का विरोध हो...

हालाँकि जबसे तुष्टिकरण की राजनीती आई है तब से ये तहजीब नाम मात्र की रह गई है और एक दूसरे के धर्म और आस्थाओ का विरोध और उनका मजाक अब आम है. 

तुलसी दास जी कह गए थे "भय बिन होत ने प्रीत गोसाई..."

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