जिस धारा 124 को लेकर है बवाल जाने उसका पूरा आगा पीछा....

"जब से जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में भारत विरोधी नारे लगे है तब से धारा 124 की विशेष चर्चा हो रही है इसपे भी इसे खत्म करने का मुद्दा मेनिफेस्टो में डाल कर बवाल"

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चुनावो के घोषणा पत्रों में शायद पहली बार ऐसा हुआ होगा जब देश में मौजूद किसी कानून को हटाने और फेर बदल करने को किसी राजनितिक पार्टी ने अपने घोषणा पात्र में शामिल किया है. चुनाव से ठीक पहले जब पुलवामा में आतंकियों का हमला हुआ और उसके बाद सेना ने बालाकोट में उनका कैंप ध्वस्त किया तो इसबार के चुनाव का मुद्दा राष्ट्रवाद हो गया.

ऐसे में अगर राष्ट्र के सम्मान को बनाने रखने से जोड़ कर देखा जाने वाली कानून की धारा 124 को जब ख़त्म करने की बात कही जाए तो मुद्दा ज्वलंत होना ही था. अभी हाल में लेफ्ट के बेगूसराय से प्रतिभागी कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मामला दर्ज है जिसपे दिल्ली राज्य सरकार ने अभी इजाजत नहीं दी है.

JNU में हुए उस कांड के समय समूचा विपक्ष वंहा के लेफ्ट समर्थक छात्रों के समर्थनमे धरने पर बैठ गया था इसलिए शायद अपने आप को न्यायसंगत ठहराने के लिए ये कानून हटाने की बात हो रही है. 121 और 122 धारा मौजूद है ये कह कर अपने निर्णय को तर्कसंगत करार दे रही है कांग्रेस लेकिन जाने 124 से क्या हो सकता है?


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इस कानून के तहत राजद्रोह की परिभाषा ये है की अगर कोई व्यक्ति भारत विरोधी सामग्री लिखता, बोलता या उसका समर्थन करता है तो उसपे ये धारा लग सकती है. राष्ट्रिय चिन्हो का अपमान और संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश भी इसी में शामिल है. 

उपरोक्त सभी माध्यमों से वो नफरत और हिंसा फैलानी की कोशिश करता है या असंतोष प्रकट करता है तो उसे तीन साल की सजा या आजीवन कारावास हो सकता है.

हालाँकि ये कानून अंग्रेजो के जमाने का है और इसे सबसे पहले बाल गंगाधर तिलक पर लगाया था अंग्रेजो ने लेकिन आजाद भारत में भी इसकी प्रासंगिता थी. कुछेक मौका पर दुरूपयोग हुआ लेकिन तब देश के न्यायपालिका तंत्र ने इसको सही कर दिया, जाने किस किस पर लगे है 124 के तहत केस और क्यों?


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1962 में केदार सिंह पर ये केस लगा था जिसके बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई थी लेकिन उन्हें कोर्ट ने छोड़ दिया, कोर्ट का कहना था की दण्डित तभी किया जा सकता है जब असंतोष बढ़े हिंसा होवे और समाज में असंतुष्टि बढ़े. 2010 में विनायक सेन नाम के (तथाकथित ऊबन नक्सली) पर भी ये केस लगा था.

2012 में कार्टूनिस्ट (ऊपर) सीम त्रिवेदी को विरोध में गंदी तस्वीरें बनाने के लिए गिरफ्तार किया गया था जिनमे संविधान और राष्ट्रिय चिन्हो को अपमान था. 2012 में तमिलनाडु के परमाणु प्लांट के विरोध कर रहे हजारो लोगो पर इस कानून का दुरूपयोग हुआ था जिसके चलते सिर्फ विवाद हुआ.

2015 में हार्दिक पटेल, कन्हैया और उम्र खालिफ पर ये धाराएं लगाई है जिसके चलते इसे मेनिफेस्टो में डाल राजनीती हो रही है.

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