एकादशी का व्रत क्यों और कैसे करे? जाने क्या है आवश्यकता हर लहजे से....

"हर महीने दो एकादशी और तीन साल में एक बार कभी एक वर्ष में 26 एकादशी आती जिनके ठीक पहले जरूर आप न्यूज़ और अख़बार में उनके बारे में पढ़ते होंगे लेकिन आखिर ये है क्या?"

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हिन्दू कलैंडर जो की युगो युगो पुराना भले ही आधुनिक अंग्रेजी कलैंडर से अलग है लेकिन इसकी गणना ऐसी होती है की वैज्ञानिक भी हैरान हो जाते है. इसमें भी दो तरह के कलैंडर है एक सूर्य मान के अनुसार तो दूसरा चन्द्र मान के अनुसार सूर्य मान की शुरुवात शुक्ल पक्ष से होती है जबकि चन्द्रमान की कृष्ण पक्ष से.

हिरण्यकश्यपु के वध के पहले सिर्फ सूर्यमान कलैंडर ही चलता था उसे वरदान था की 12 महीनो में ही न मारा जाऊ तो ब्रह्मा जी ने चन्द्रमान से कलैंडर बनवाया और 13 वा महीना (अधिकमास) हुआ जिसमे उसका वध हुआ. चन्द्रमान के अनुसार हर महीने 29.5 दिन होते है जिसके चलते 32 माह 16 दिन 8 प्रहार और उसके 24 वे भाग के बाद आता है अधिकमास.

दोनों ही कलैंडर में महीने की शुरुवात प्रतिपदा यानी प्रथमा तिथि से होती है, वैसे तो सभी तिथियां किसी न किसी देव या भगवान् से जुडी होती है लेकिन एकादशी शिव और विष्णु दोनों से ही जुडी है. आखिर क्यों इस दिन अन्न नहीं ग्रहण किया जाता क्यों उपवास रखा जाता है कैसे रखा जाता है व्रत और क्या है आवश्यकता?

जाने इस विषय में सब कुछ....


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पहले तो जाने एकादशी की शुरुवात कैसे हुई, योग निंद्रा में सोये थे भगवान् तब उनके ही शरीर से एक मुर नामक राक्षस प्रकट हुआ था. उस राक्षस ने उन सोये हुए भगवान् पर ही हमला करना चाहा तब भगवान् विष्णु के शरीर से एकादशी का प्राकट्य हुआ जिसने उस मुर का वध किया इसी के चलते भगवान् मुरारी कहलाते है.

तभी ये एकादशी को भगवान् ने मोक्ष दायिनी तिथि बना दिया, इस दिन अन्न भगवान् की शरण में रहते है इसलिए इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए. वृद्ध, बालक और बीमार इन सभी को छोड़ बाकि सभी के लिए इस दिन अन्न ग्रहण करना पाप है, दिन में तीन बार फलाहार करके, एक बार फलाहार करके, सिर्फ पानी पर या निर्जल अपनी शक्ति के अनुसार करे व्रत.


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अघोरी, यतियों और विधवाओं के लिए और शिव भक्तो के लिए भी वैसे एकादशी करने का विधान है जिसमे की दशमी तिथि के साथ होने वाली एकादशी की जाती है. लेकिन बाकियो के लिए दशमी तिथि के साथ एकादशी जहर के समान कही गई है इसलिए वैष्णव एकादशी ही की जानी चाहिए.

पारण (व्रत खोलना) भी सबसे ज्यादा पुण्य दायक है, व्रत के पहले दिन रात में भोजन न करे और व्रत के दिन अपनी शक्ति के अनुसार व्रत करे (ऊपर बताये गए तीन उपायों से) द्वादशी तिथि के दिन ही सुबह के समय व्रत खोलना चाहिए. अगर एकादशी द्वादशी और त्रयोदशी भी साथ हो तो इसका पुण्य अतुलनीय हो जाता है.

दिन में सोने से, पान और शहद खाने से, कांसे की थाली में खाने से भी व्रत भंग हो जाता है! रात्रि जागरण से और ज्यादा फल होता है लेकिन भूख सेहन न हो तो फलाहार कर के ही करे अन्यथा पाप के भागी होंगे.... 

*इसके अलावा भी कुछ जानना चाहते है तो कमेंट बॉक्स में कमेंट करे...

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