विदुर जी के घर छिलके खाने क्यों गए थे श्री कृष्ण, शुरू की तब एक परम्परा!

"आज हरी आये है विदुर घर पावना....जब श्री कृष्ण विदुर जी के घर गए थे तब उसके पीछे क्या मकसद था आखिर क्यों खाये छिलके और शुरू की तब कौन परम्परा उन्होंने. जाने सब.."

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भगवान् कृष्ण को जगतगुरु कहा जाता है जिन्होंने थोड़े ही समय में पुरे संसार में करोडो कर्म कर दिए और हर किसी को कुछ न कुछ सिखाया. आज भी हम अपने दैनिक जीवनचर्या में ऐसी बहुत सी बातें करते है जिनकी शुरुवात (परम्परा की) श्री कृष्ण ने ही की थी.

धार्मिक यात्राओं में भंडारे लगाए जाते है वो भी श्री कृष्ण ने ही अपने एक भक्त के लिए लगाने शुरू किये थे, ऐसी ही लड़की की शादी में श्रमदान हो या भांत सभी उन्ही की देन है. ऐसी ही एक परम्परा हम निभाते है जिसके तहत हम जब भी किसी बरात में जाते है तो उस शहर में मौजूद गाँव की बहिन बेटी से जरूर मिलते है.

ये प्रथा कैसे शुरू हुई ये भी जाने, कौरवो और पांडवो में संधि के लिए श्री कृष्ण हस्तिनापुर आये थे तब विदुरानी जी जो की मथुरा से थी अधीर हो गई, मेरे मायके से राजकुमार कृष्ण आ रहे है! उनके मन में ये विचार आया की क्या वो मेरे घर आएंगे, गरीब के घर पकवान छोड़ कौन आता है ये सोच उन्होंने भोजन कर लिया और श्री कृष्ण के बारे में सोचते हुए ही कपड़े समेटने लगी!

जाने तब क्या हुआ?


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श्री कृष्ण तो भावना देखते है दुर्योधन का मेवा छोड़ निष्पक्ष विदुर जी के घर भोजन करने ही पहुंच गए, बुआ भतीजा तेरे शहर में आया है खाना बनाया है के चूल्हा ठंडा कर दिया है! श्री कृष्ण की आवाज सुन विदुरानी जी घबरा गई और श्रीकृष्ण की अगुवाई में दौड़ी द्वाप पर आई श्री कृष्ण को देखकर भाव विभोर हो गई.

श्री कृष्ण को बैठाया भाणु भूखा है सोच रसोई में गई लेकिन कृष्ण ने कहा जो है जल्दी ले आओ कुछ बनाना नहीं तो केले ही लेकर आ गई. छलिये को देख मोहित हुई विदुरानी केले तो निचे फेंकने लगी और छिलके ही कृष्ण को खिलाने लगी, प्रेम के भूखे कृष्ण बहुत मीठे हे कहते हुए वो छिलके ही खाने लगे.

इतने में विदुर जी आये विदुरानी को चेत कराया और खुद छील कर केले की गिरी खिलाने लगे तो कृष्ण ने कहा की अब बुआ की भावना जैसा स्वाद नहीं है विदुर जी! इसी परम्परा का न्याय रखने आज भी हम सभी जब बारात में जाते है तो ऐसा ही करते है हालाँकि आज संचार और यातायात के साधन होने से इन परम्पराओ में कमी आ गई है.

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