बॉलीवुड फिल्मो में पुरुष बलात्कार को भी सामान्य बात दिखाया जाना कितना सही?

"बॉलीवुड फिल्मो में गे (वेस्टर्न) संस्कृति को भी कॉमेडी के रूप में दिखा दिया और उसे सामान्य बताया ऐसे ही बलात्कार (पुरुष) को भी अब स्वीकार्य करवा रहा है ये तपका"

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अगर किसी भी काम को न्यायसंगत या फिर सामान्य बात लोगो की नजरो में मनवाना है तो ये काम फिल्मो के जरिये आसानी से किया जा सकता है. फिल्म इन्साफ का तराजू में राज बब्बर द्वारा किया गया नाबालिक लड़की (पद्मिनी कोहलपुरी) से रेप भी कुछ ऐसा ही था जिसके लिए राज बब्बर को फिल्म फेर भी मिला था.

ऐसे ही पुरुष बलात्कार को लोग हंसी मजाक में लेते है और कानून भी देश में ऐसा ही है की पुरुष बलात्कार पर महिला को सजा नहीं हो सकती है. इसलिए बॉलीवुड में भी कुछ फिल्मो ने इसका मजाक बनाया और इसे ऐसा दिखाया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो उसके साथ.

फिल्म "बद्रीनाथ की दुल्हनिया" आपने देखि होगी जिसमे आलिया को बचाने के चक्कर में खुद वरुण धवन को अपनी इज्जत के लाले पड़ जाते है. उस घटना के बाद फिल्म में आलिया और धवन का दोस्त खुद हँसते हुए नजर आते है जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो और अगर वो ही आलिया के साथ होत्ता तो माजरा कुछ और होता.

आखिर ऐसा क्यों?


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एक फिल्म आई थी BA पास जिसमे एक ग्रहणी एक मजबूर लड़के को जबरन निजी रिश्तो के लिए उकसाती है जिसका वो कुछ देर के बाद विरोध  नहीं करता है जैसा की वेस्ट में महिलाये अपने रेप के दौरान करती है और उसका आनंद लेने लगती है ये कुछ वैसा ही दिखाया गया था.

बाद में उस लड़के को वैश्यावृति में झोक दिया जाता है और मजबूरी में वो ये काम करने लगता भी है जिसका अंत बेहद गंदा होता है.


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फिल्म पेज 3 में भी रईस लोग फुटपाथ के मर्द बच्चो के साथ गंदे काम करते दिखाए गए थे जिसमे की जरूर इस अपराध की निंदा हुई थी लेकिन वो इस सूरत में की बच्चे नाबालिक थे. इसलिए फिल्म निर्माण के लोगो को ये बात ध्यान में रखनी चाहिए की उनके दर्शक ज्यादातर सामान्य सोच वाले है.

वेस्टर्न संस्कृति की सोच वाले नहीं....

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