बैजू बावरा : तानसेन को अकबर के दरबार में हराकर लिया था अपने पिता की मौत का बदला

"संगीत की बात हो तो आप तानसेन का नाम ही लेते है लेकिन क्या ये ही हक़ीक़त थी? तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास (निधिवन वाले) थे उनके ही एक और चेले बैजू बावरा ने जब लिया"

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मुग़ल काल में एक प्रसिद्द संगीतज्ञ हुए थे जिनका नाम था बैजू पंडित, जब संगीत की बात होती है तो नाम तानसेन का आता है लेकिन असलियत है या की तानसेन के गुरु के ही दूसरे शिष्य बैजू तानसेन से भी कंही आगे थे और संगीत सम्राट थे. जिन रागो का तानसेन अभ्यास करते थे उन सभी में बैजू पंडित पारंगत गुरुकुल में ही हो गए थे...

ऐसा भी कहा गया है की उनके इस कौशल को देख अकबर ने उन्हें भी अपना नवरत्न बना लिया था जिसमे सभी कलाकार ही शामिल थे. गुजरात के चम्पानेर में बैजू का जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था, पिता की मौत के बाद उनकी माँ वृन्दावन में विधवाओं के साथ आकर रहने लगी थी.

तब बैजू की मुलाक़ात स्वामी हरिदास से हुई थी जो की तानसेन के भी गुरु थे और वंही उनके वो शिष्य बन गए थे, वंही उन्होंने शादी की थी और एक अंधे बच्चे को गोद ले लिया था. उस बच्चे का नाम गोपाल था और वो भी एक मशहूर संगीतज्ञ बन गया था कहते है की ग्वालियर के राजा मानसिंघ के यंहा ये पिता पुत्र रत्नो में शुमार थे.

जाने कैसे बने बैजू बावरा और तानसेन के घमंड को कैसे तोड़ा....???


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मानसिंघ की रानी मृगनयनी कश्मीर की राजकुमारी थी और वो अपने साथ बैजू को वंहा गवाने ले गई थी, इसी दौरान गोपाल ने आगरा में गीत गया था जिसके बाद वो गायब हो गए थे. अपनी पोती मीरा और बच्चो को ढूंढने में बैजू पागलो की तरफ घूमते फिरे थे जिसके चलते उनका नाम बैजू बावरा हो गया.

1952 में आई फिल्म बैजू बावरा के अनुसार तानसेन के पिता की मृत्यु उस दुर्घटना में हो गई थी जिसमे तानसेन से बेहतर न होने वाले संगीतज्ञ को आगरा में गाने की अनुमति नहीं मिलती थी. इसका बदला लेने और अपने पोती, बेटी बहु को छुड़ाने तानसेन को अकबर के दरबार में उन्होंने परास्त कर अपने पिता की मौत का बदला लिया था.

तब से तानसेन के स्थान पर बैजू अकबर के दरबार में विराजमान हुए थे, दीपक राग हो या मल्हार सब में पारंगत थे बैजू बावरा.

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