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अगर आपको लगता है की हिन्दू गुप्तांगो (शिव लिंग) की पूजा करते है तो ये जाने...

"सोशल मीडिया पर किसी सेक्युलर या नास्तिक को अपने ये कहते सुना होगा की हिन्दू गुप्तांगो की पूजा करते है भले ही उसे गालिया पड़ती हो लेकिन क्या आप सच जानते है? जाने"
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कई सेक्युलर और हिन्दुओ से नफरत करने वालो और अज्ञानियों से अपने ये कहते सुना होगा की हिन्दू गुप्तांगो की पूजा करते है. इतना ही नहीं बहुत से हिन्दुओ के मन में भी ये बात बैठ गई है की जो शिव लिंग है वो असल में शिव का गुप्तांग है और ऐसे में सेकुलरो की गंदी विचारधारा को बल मिलता है.

ऐसे ही कई मनगंढ़त कहानिया भी आपने पढ़ी होगी (जो वेद शाश्त्र में नहीं लिखी है) के शिव जी को श्राप मिला लिंग रूप में पूजित होने का फ्ला फ्ला. ऐसे ही असम के महान शक्तिपीठ कामाख्या के बारे में भी आपने कई बातें सुनी होगी की वंहा शक्ति के गुप्तांग की पूजा होती है, लेकिन असल में सच्चाई बेहद आश्चर्य जनक है जो की छुपी हुई है.

अगर आपने सरकारी स्कूल में संस्कृत पढ़ी है तो आपने व्याकरण भी पढ़ा होगा जिसमे आपने लिंग भेद पढ़े होंगे. पुरुष वाचक के लिए पुल्लिंग, स्त्री वाचक के लिए स्त्रीलिंग और किन्नर के लिए नपुसकलिंग हालाँकि कलियुग में एक और लिंग बन गया है जो अपने पढ़ा नहीं होगा वो है उभयलिंग जिसे आंग्ल (इंग्लिश) भाषा में गे/लेस्बियन कहते है. 

यंहा लिंग का अर्थ क्या गुप्तांग है? जाने सनातन सत्य....


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असल में लिंग का अर्थ प्रतीक होता है पुल्लिंग का अर्थ जबकि सेक्युलर पुरुष गुप्तांग लगाते है और प्रचारित करते है जबकि स्त्री पुरु के गुप्तांग को जननांग कहते है यानि बच्चा पैदा करने का साधन अंग. लिंग का अर्थ होता है प्रतीक और निराकार शिव शक्ति की हम लिंग यानि साकार प्रतीक रूप में पूजा करते है.

निराकार की उपासना बेहद कठिन है इसलिए भक्तो के लिए शिव ने साकार रूप में पूजित होने के लिए ही लिंग रूप में पूजित होकर सहायता की है. ऐसे ही दक्ष यज्ञ में प्राण छोड़ने वाली सती की देह को ले जाते शिव जब विचलित हो असमय प्रलय के लिए तांडव करने लगे तो विष्णु जी ने उनकी (सती की) देह के 52 टुकड़े कर दिए थे.

इन्ही में से जंहा सती का जननांग गिरा वो स्थान कामाख्या शक्ति पीठ के रूप में पूजित हुआ, जिन जिन स्थानों पर माँ का जो भाग गिरा वो स्थान तीर्थ क्षेत्र हो गए. वंहा उन क्षेत्रो की पूजा की जाती है न की माँ के जननांग की वो तो शिला रूप हो चुके है, पुजारी ही मंदिर के पट्ट तीन दिन बंद कर प्रसाद में कपड़ा बांटते है.

हो सकता है वो स्थान रजस्वला होता होगा (हमने नहीं देखा) लेकिन उस स्थान की ही महिमा है जैसे प्रयाग और 7 पुरियो की है.


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भक्त/पुजारी ही भगवान् को पूजित करवाता है, जंहा कंही किसी भक्त ने भगवान् को प्रसन्न किया वंही भगवान् प्रकट हुए और अपने प्रतीक रूप में शिव ने शिव लिंग की स्थापना की जो की आज 12 ज्योतिर्लिंग और उपलिंग के रूप में पूजित होते है. 

ऐसे ही जंहा जंहा भगवान् ने जन्म लेकर अपनी लीलाये की वो स्थान भी तीर्थ हो गए, मथुरा काशी वृन्दावन द्वारका रामेश्वरम आदि आदि ये स्थान हो या ज्योतिर्लिंग या शक्ति पीठ हो सभी भगवान् के प्रतीक रूप के क्षेत्र है जंहा विचरने से हममे सतगुण पढ़ता है हमारे पुण्य बढ़ते है.

अब से कोई अगर आपको हमारी आस्था को गुप्तांगो की आस्था कहे तो उसे ये जवाब दे या उसका बहिष्कार करे...
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