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चेला लायक हो तभी गुरु को देनी चाहिए गुप्त शिक्षा, द्रौणाचार्य की आलोचना गलत है....

"गुरु का भारतीय इतिहास में कितना महत्त्व है ये इस बात से ही जाने की खुद राम कृष्ण को भी गुरु की आवश्यकता पड़ी थी ज्ञान प्राप्ति के लिए, लेकिन अगर आप द्रोण से वैर"
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image sources : Thehinduportal

आज शिक्षा एक धंधा बन गया है, चिकित्सा-शिक्षा और राजनीती ये तीनो ही सेवा का माध्यम थे कभी लेकिन अब ये तीनो ही सबसे बड़ा धंधा बन गया है भारत में. निजी स्कूल वाले, निजी अस्पताल वाले या राजनैतिक पार्टिया सभी धड़ा धड़ पैसे कमा रहे है और जनता को लूट रहे है.

आज शिक्षा पर बात करेंगे के पूर्व काल में क्या होता था शिक्षा का मापदंड, ब्राह्मण तब नगर में निवास नहीं किया करते थे बल्कि वन में नदी किनारे ही रहा करते थे अपने परिवार के साथ जिसे आश्रम व्यवस्था कहते है. उनकी योग्यता के अनुसार उनके पास राजा महाराजाओ, वैश्यों और क्षुद्रो के बच्चे पढ़ने आते थे.

इसके बदले वो कुछ लेते नहीं थे बल्कि उन बच्चो से अपने आश्रम का काम करवाते थे और उनके स्थान पर तब उनके शिष्य भिक्षा मांग कर लाते थे उसी से सब मिल बाँट कर खाते थे. शिक्षा पूर्ण हो जाने पर शिष्यों के परिवार अपनी औकात के हिसाब से उन गुरुओ को दक्षिणा देते थे जो की मांग कर नहीं ली जाती थी.

ये थी तब शिक्षा व्यवस्था, लेकिन गुप्त शिक्षा और मोक्ष की शिक्षा देने के कुछ सिद्धांत थे ऐसे गुरुओ के लिए जाने वो क्या थे???


image sources : Pinteret

शिक्षा के लिए गुरु अलग होता है और मोक्ष दायी गुरु अलग होता है, शिक्षा आजीविका का साधन बनती है तो गुरु मन्त्र मोक्ष का. सबसे पहले ब्रह्मा जी के पुत्र वशिष्ठ राजगुरु बने थे जो की एक निन्दित कर्म था लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा की उसका उन्हें सुफल मिलेगा और इसी के चलते श्री राम लक्षण ने उनके पैर दबाये थे जो की उनके लिए सौभग्य की बात थी.

मोक्ष और गुप्त शक्तियों की शिक्षा देने के लिए गुरु को पहले शिष्य की परीक्षा ली जानी चाहिए, उनके मापदंडो पर जब वो खरा उतरे तभी उसे गुप्त शिक्षा दी जानी चाहिए. श्री कृष्ण के गुरु सांदीपनि के गुरु ने उन्हें शिक्षा नहीं दी बल्कि वो उन्हें प्रताड़ित करते थे लेकिन वो कुछ नहीं बोलते और गुरु आज्ञा से निन्दित से निन्दित कर्म भी करते थे.

तब अपनी मौत के पहले उनके गुरु ने सांदीपनि को अपनी पूरी गुप्त शिक्षा दी थी, जिसके चलते श्री कृष्ण बलराम उनके शिष्य बने थे. यदुवंशी एकलव्य (जिसे भीलो ने पाला था) को इसलिए ही द्रोण ने शिक्षा नहीं दी थी, क्योंकि उसके पिता (श्री कृष्ण के चाचा) ने भी उसका त्याग कर दिया था उसकी कुंडली में उसका दुराचारी भविष्य देख के.

ऐसे ही द्रौण ने कर्ण को शिष्य तो बनाया लेकिन ब्रह्माश्त्र की शिक्षा नहीं दी क्योंकि वो उसकी नियत जान गए थे, इसलिए कर्ण ने धोखे से  परशुराम से ये शिक्षा पाई थी. 
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