सती शव लेकर तीनो लोगो में रोते हुए घूमे थे शिव, पत्नी प्रेम की दिखाई थी अतुलनीय पराकाष्ठा

"सीता का रूप धरने पर पहले सती का मानसिक त्याग फिर दक्ष यज्ञ में प्राण छोड़ने वाली सती का बदला और उसके बाद उसके शव को लेकर तीनो लोगो में रोते घूमने के आलावा शिव ने"

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पार्वती से शिव के रिश्ते मांगने बारात लेकर आने और फेरो तक की कथा आपने हमारे पहले के लेखो से जानी, लेकिन क्या आप जानते है पार्वती से भी शिव विवाह के लिए तैयार नहीं थे? शाश्त्रो में ये बताया गया है की हर कल्प में (ब्रह्मा जी के दिन में) शिव और पार्वती विवाह करते है. 

इसके पीछे उनका उद्देश्य होता है ग्रहस्थो के लिए लोक मर्यादा स्थापित करना, इसके तर्ज पर हम सभी भारतीय आज भी उसी विधि से विवाह करते है. वर्तमान कल्प में जब रामायण के दौरान जी के सामने सीता के रूप में जाने पर शिव ने सती का मानसिक त्याग कर दिया था!

हालाँकि शिव ने मुंह से बोल के कुछ नहीं कहा था लेकिन उनके मन में लिए इस संकल्प को जान भविष्यवाणी में उनकी प्रसंसा की गई थी. शिव जी से तब सती ने इस संकल्प के बारे में पूछा लेकिन उन्होंने कोई उतर नहीं दिया, तब उन्हें पता चला की उनके पिता यज्ञ करवा रहे है लेकिन पति को नहीं बुलाया.


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तब सती शिव से पिता के यज्ञ में चलने को कहने लगी लेकिन बिना बुलाये नहीं जायेंगे ये कह कर शिव तैयार नहीं हुई. लेकिन त्रिया चरित्र (औरत के स्वाभाव वश या यु कहे देह त्याग की इच्छा से ही) के चलते सती पिता के यज्ञ में गई जंहा उनकी माँ तो बहुत प्रसन्न हुई लेकिन पिता ने उनसे बात नहीं की थी.

पिता ने पति को नहीं बुलाया और यज्ञ भाग भी नहीं दिया ये सोच कर सती ने पिता से सवाल जवाब किये लेकिन पिता ने कोई संतोष जनक उत्तर नहीं दिया बल्कि शिव जी के प्रति कटु वचन कहे.

इस शरीर को शिव अब नहीं अपनाएंगे ये जान सती ने दक्ष यज्ञ में पति के अपमान के बहाने अपने प्राण छोड़ दिए थे जिसके बाद दक्ष यज्ञ वीरभद्र नई विध्वंश कर दिया था. तब देवताओ के कहने पर शिव यज्ञ में आये और उसे पूर्ण करवाया, उसके बाद शिव सती की मृत देह को कंधे पर उठाकर चल दिए और उनके विरह में रोने लगे. 


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पत्नी के विरह में वो त्रिलोकी में रोते हुए भटकते रहे, जंहा जंहा उनके आंसू गिरे वंही रुद्राक्ष हो गए! उन रुद्राक्ष को भी उन्होंने तब अपनी शरीर पर धारण कर लिया, अंत में वो क्रोधित हो गए और पृथ्वी में असमय प्रलय लाने के लिए तांडव करने लगे, तब भगवान् विष्णु ने चक्र से सती की देह के 52 टुकड़े कर दिए जो आगे चलकर शक्तिपीठ बने गए!

उस समय आये विष्णु के गरुड़ को देख नाग भयभीत हो गए थे तो शिव ने उन्हें अपने शरीर में शरण दी! शिव जी ने तब सती की देह की राख को अपने शरीर पर धारण कर लिया था, सती की अस्थियो की माला बनाकर वो आज भी पहने हुए रहते है. सती के वियोग में उनका सिंह भी मर गया तो शिव ने उसे भी अपने शरीर पर लपेट लिया.

जब सती पार्वती बन जन्मी और उन्हें पाने को तपस्या करने लगी तो देवो ने उन्हें पार्वती को अपनाने के लिए कहा लेकिन वो मुकर गए, अनंत भगवान् विष्णु ने अपनी शपथ दी तो वो तैयार हुए! होली के दिन सती से विवाह किया था शिव ने, शिव रात्रि के दिन फिर पार्वती से किया था विवाह!

श्रावण के दौरान ही उन्होंने पिया था हलाहल इसलिए ये माह उन्हें है प्रसन्न करने वाला.

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