शिव जी को देख पार्वती की माँ मैना देवी ने फेंक दी थी पूजा की थाली, गई कोप भवन में

"महाशिव रात्रि शिव भक्तो का पावन पर्व है इस दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए इस दिन को सभी उपवास और जागरण करते है लेकिन इस दिन की कहानी बेहद मजेदार है..."

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भगवान् शिव और शक्ति की जोड़ी वैसे तो अनादि काल से है लेकिन लोक शिक्षा के लिए हर कल्प में वो दोनों हर बार विवाह करते है. आपको जानकर आश्चर्य होगा की आज भी हिन्दू धर्म में विवाह संस्कार एकदम वैसे ही होते है जैसे शिव पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था.

इसके पूर्व जन्म में भी दक्ष पुत्री सती का विवाह शिव जी से हुआ था और दक्ष द्वारा जमाता के अपमान के चलते सती ने उनकी ही सभा में आत्मदाह कर लिया था. जिसके बाद वो पार्वती रूप में हिमालय के घर जन्मी थी और पिता की आज्ञा लेकर नारद जी की प्रेरणा से शिव जी को वर रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या करने लगी.

शिव जी प्रसन्न हुए और अपने साथ तुरंत चलने को कहा तो पार्वती जी ने उनसे अपने पिता से उनका हाथ मांगने को कहा, सप्तऋषियों ने शिव जी के लिए हिमालय से उनकी बेटी पार्वती का हाथ माँगा. रिश्ता पक्का हो गया बरात हिमालय के दरवाजे पर पहुँच गई लेकिन तब एक ट्विस्ट आ गया.

पार्वती की माँ ने शिव जी को बेटी ब्याहने से कर दिया इंकार....


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असल में मैना देवी के मन में थोड़ा घमंड था उन्हें पता चला की शिव तो शमशान निवासी है उनके सेवक भूत गण पिशाच आदि है ऐसे में उनकी बेटी कैसे उसके साथ रहेगी. फिर भी उसने पति के कहने पर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी, शिव जी उसके मन की बात जान गए थे और वो जानबूझ कर अघोर रूप में दूल्हे बन पहुंचे होने वाले ससुराल.

मैना देवी ने उन्हें ऐसे देखा तो चकरा गई और पूजा की थाली फेंक दी, कोप भवन में जाकर बैठ गई और पार्वती से कहा की उसके साथ विवाह नहीं होने दूंगी. तब नारद जी मध्यस्थ हुए उन्होंने मैना के मन के घमंड को दूर करा फिर शिव जी से सौम्य रूप धारण करने को कहा.

शिव जी ने वैसा ही किया, उनके उस रूप को देख कन्या पक्ष की सभी औरते पार्वती के भाग्य पर गर्व करने लगी और तब जाकर हुआ दोनों का विवाह. अपने हिन्दू विवाह में ये परम्परा देखि होगी जो ऊपर चित्र में है, असल में पहले सासु होने वाली जमाई को नहीं देखती थी इसलिए वो द्वार पर आये हुए का ही निरिक्षण करती थी.

जब तक 7 फेरे ने हो कन्या पिता चाहे तो किसी सर्वोत्तम को दे सकता है....

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