वर्णव्यवस्था (त्रेता द्वापर युग) और जाती व्यवस्था (कलियुग) में है बड़ा अंतर, जाने...

"धर्म को जानने वाले बिना मांगे ज्ञान देते नहीं है और जो नहीं जानते है उनसे जवाब मांगते है वो लोग जो कभी दबे कुचले गए थे, वर्ण और जाती व्यवस्था को एक ही मानते है"

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आज के समय में जो दलित चिंतक है वो सभी भारत में जातिगत राजनीती पर सवाल उठाते है और उसे धर्म से जोड़ते है लेकिन असल में जाती का धर्म से कोई लेना देना नहीं है. सतयुग में तो सिर्फ एक ही वर्ण होता है लोग सिर्फ आश्रम में ही निवास करते है और सिर्फ मोक्ष की चेष्टा ही धर्म होता है.

त्रेता युग से वर्ण व्यवस्था शुरू होती है जो की द्वापर तक चलती है, वर्ण व्यवस्था क्या है वो हम पहले ही विस्तार से बता चुके है. असल में सतयुग के लोगो ने त्रेता की शुरुवात में काम आपस में बाँट लिए सिर्फ मोक्ष की चेष्टा न करके तब लोग क्षत्रिय, व्यापारी और मजदुर/नौकर भी बन गए थे.

सतयुग में सभी गौरे रंग के इंसान होते थे और अपने काम को छोड़ दूसरा काम पकड़ने के चलते उनके रंग बदल गए इसलिए उनके कामो को वर्ण (रंग) के अनुसार पहचान दी जाने लगी. आज कलियुग में जो जाती व्यवस्था है वो उस वर्ण व्यवस्था का कलियुग के प्रभाव से ही बिगड़ा हुआ रूप है.

जाने इसके बारे में थोड़ा और विस्तार से....


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जाती व्यवस्था कुछ और नहीं बल्कि वर्ण का ही बिगड़ा हुआ रूप है, असल ये वंश संतति है. ब्राह्मणो की जाती गौत्र से पहचानी जाती है जो की विवाह में काम आती है, यानी एक ही वर्ण के लोग अपने गौत्र में विवाह नहीं करते है और ये गौत्र ही उसकी जाती बन जाती है मतलब ये वर्ण में वर्ण है न की अलग जाती.

ऐसे ही क्षत्रियो में 36 कौम है जो की उनकी अलग अलग जाती है आज के दौर में, ऐसे ही वैश्यों (व्यापारी, किसान और गौपालक) में भी ऐसी ही जाती है. क्षुद्रो में भी ऐसी ही गौत्र परम्परा है जिसके अंदर वो आपस में विवाह नहीं करते है.

सतयुग के अंत में जिन लोगो ने दासता स्वीकार करने की बात स्वेच्छिक रूप से मानी उन्हें ही क्षुद्र कहा गया जो की सबसे निम्न दर्जे का काम था. इस व्यवस्था में क्षुद्र का तन मन धन स्वामी का हो जाता था और उस क्षुद्र की सम्पूर्ण जिम्मेदार स्वामी की होती थी इसलिए उन्हें निन्दित कहा जाता था.

त्रेता द्वापर में तो उन्हें तिरस्कृत नहीं किया गया लेकिन कलियुग में उनके साथ अत्याचार हुआ जिसके चलते ही 80% निराकरण के बावजूद अब भी क्षुद्र समुदाय में रोष है. जबकि नौकरी पेशा को ही क्षुद्र कहा जाता है और आज तो 50% लोग नौकरी पेशा ही है.....

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