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घर में पड़ी थी जवान बेटे की लाश, फिर भी अतिथि को दिया सम्मान तो हुआ चमत्कार....

"अतिथि देवो भवः यानी बिना किसी (घर में) समारोह औचक ही कोई अनजान राहगीर व्यक्ति आपका अतिथि बन जाए तो उसकी भगवान् की तरह पूरी आव भगत करो! पहले लोग पैदल यात्रा ही.."
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"अतिथि देवो भवः" यानी मेहमान भगवान् का रूप है ये भारतीय संस्कृति ही नहीं बल्कि सनातन धर्म और हिन्दू धर्म की मुख्य मान्यता है. अतिथि मलतब औचक ही कोई याचक नहीं बल्कि यात्री जो बिना किसी त्यौहार के ही घर पर मेहमान बनने के लिए आ जाये तो वो ही अतिथि है उसका सम्मान आपको मोक्ष दिला सकता है, कैसे इसके लिए जाने एक भक्त की कथा.

अवंतिका पूरी (उज्जैन) में एक परिवार रहता था, घर के प्रमुख दीनबंधु पत्नी, दो बेटो और एक बहु के साथ रहते थे और भगवान् के भक्त थे. परिवार हिन्दू धर्म (शाश्त्र) के अनुसार जीवन यापन करता था और अतिथि देवो भवह के मन्त्र को सच्चे मन से अपना रखा था ज्यादा समय पूजा में और बाकि मेहमान को भगवान की तरह मान सेवा में .

इसी कारन दीनबंधु को लोग भक्त के नाम से बुलाते थे, उनके यश की कीर्ति देव लोक तक में गूंजने लगी तो भगवान ने स्वयं उनकी भक्ति और निष्ठां की परीक्षा लेनी चाही. परिवार में आपस में इतना प्रेम था की मानो कोई भी एक दूजे के बिना रह नहीं सकता हो पर होनी को कौन टाल सकता है. 

एक दिन बड़े बेटे को सर्प ने काट लिया और वो मर गया, पुरे परिवार में मातम था पर कोई रोया नहीं, हालाँकि शोकाकुल सब थे तभी घर के दरवाजे से किसी ने आवाज दी...


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असल में भगवान ही एक साधु के रूप में उनके घर पधारे दिनबंधू ने उनकी अगुवाई की, साधु ने अतिथि बनने की इच्छा जताई तब उन्हें सादर बैठने को कहा गया. दीनबंधु ने अंदर जाके अपने परिवार वालो से कहा की रोने और विलाप से कोई मतलब नही होगा जिसे जाना था वो गया. 

बाहर एक साधु आये है जो की भूखे है और हमारे अतिथि है, अच्छा होगा की हम अपना धर्म निभाए. इतना सुनना था की पूरा परिवार उठा और नहाया धोया लाश को पड़ा रहने दिया, अंतिम संस्कार को भूल गए यंहा तक की मृत बेटे की पत्नी भी नही और साधु के लिए भोजन तैयार किया.

अब एक और समस्या हो गई, उन्होंने बेटे की मौत और लाश के बारे में साधु को बताया नही था. साधु ने कहा की आप लोगों के साथ बैठ कर मैं आनंद से खाना खाना चाहता हूँ, ये भी मांग मान ली गई पर जब साधु ने कहा की आप लोग तो 5 सदस्य है तो बाकि एक कान्हा गया? 

इस पर दीनबंधु उनके पैरो में गिर के रोने लगा और माफ़ी मांगते हुए पूरी बात बताई.


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इस पर साधु ने सब से कहा की तुम लोग कितने क्रूर हो अपने परिवार के सदस्य की लाश पे भी तुम नहा धो के खाना बना लिए लाश के बारे में और शोक के बारे में नहीं सोचा तो सबने क्या उत्तर दिया अलग अलग बताते है.

दीनबंधु ने कहा की आत्मा अमर है हम क्यों उस के लिए विलाप करे जो मारा ही नहीं, उसके चलते हम क्यों अपने धर्म से डिगे.
माता ने कहा की वो मुझे बेहद प्यारा था और मुझे उसके जाने का बेहद अफ़सोस है पर अब वो मेरी जिम्मेदारी नही परमात्मा की जिम्मेदारी है तो मैं खुश हूँ की वो परम सेवा में है.

छोटे भाई ने कहा की गम तो बहुत है पर जैसा की पिता जी ने कहा की आत्मा अमर है और हम धर्म पे चल के ही परमात्मा तक पहुँच सकते है.


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पत्नी जो पति खो चुकी है वो बोली की मैंने अपने पति को भगवान मानते हुए पूजा, मैं खुशकिस्मत हूँ की भगवान ने मुझे स्वयं को प्रत्यक्ष रूप में पूजने का मौका दिया. अब जब वो उन्हें वापस ले गए है तो मैं क्यों दुखी होवू जब वो मेरे थे ही नहीं, मैं अपने धर्म पर चल कर ही परमात्मा तक पहुँच सकती हूँ.

चारो के जवाब सुनते ही भगवान प्रसन्न हुए और मारा हुआ पुत्र जीवित हो खड़ा हुआ, साधु ने भगवान का रूप लिया और परिवार को दर्शन दिए. इस पर परिवार ने भगवान से शिकायत की के आप साधु रूप में आये और हमें आपके प्रत्यक्ष रूप के आतिथ्य का मौका नही दिया, तो भगवान ने उन्हें फीस से मौका दिया और पुरे परिवार की मुक्ति हुई. जय श्री राधे 

नोट : सूतक/पातक लगे घर में भोजन नहीं करना चाहिए....
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