वैश्याओ का दीवाना था ये भक्त, भक्ति जागी तो फोड़ ली अपनी ही आँखें....

"एक दिन भगवान कृष्ण ग्वाले के रूप में आये और उससे बोले की मैं तुम्हारे लिए मिठाई और पानी लाया हूँ इसे खालो, अपने परिचय पूछे जाने पर कृष्ण ने कहा की में एक ग्वाला"

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कृष्ण-वेणी नदी के तट पर एक पंडित रहता था जिसका नाम रामदास था, उनके पुत्र का ही नाम था बिल्वा मंगल. मंगल पुरे सनातन संस्कृति के माहौल में पला बढ़ा था और पुरे शाश्त्रो का उसे गया था लेकिन माँ की मौत हुई वो बुरी संगती में पड़ गया, जागीर बहुत थी इसलिए दोस्तों के बहकावे में आना स्वाभाविक ही था.

कुसंगति का ही असर था की पढ़ा लिखा ब्राह्मण भी वेश्यागमन करने लगा, एक बेहद सुन्दर वैश्या थी जिसका नाम था चिंतामणि उसी की वासना में बिल्वा मंगल ऐसा डूबा की मर्यादा शर्म लाज सब कुछ भूल कर सब कुछ उसपे लूटा दिया. "काम!तुरणम् नभयं नलज्जा" उसी की बाँहो में दिन रात पड़ा रहता था. 

एक दिन वो भी आया जब पिता भी चल बसे, बिल्वा कोई कोई शोक नहीं हुआ उसका मन तो राम में वैश्य के पास जाने की वासना में था. अंतिम संस्कार करना उसकी मज़बूरी थी, वो जबरदस्ती बिना मन के ये सब कर रहा था. गाँव घर गली के बुजुर्गो ने आज के दिन वैश्या के पास न जाने की सलाह दी पर उसे फर्क नहीं पड़ा. 


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वैश्यालय नदी के पार था, उस रात जोरदार बारिश हो रही थी और तूफानी हवाएं चल रही थी नदी में बाढ़ सी गए गई, कोई भी मांझी उसे पार करने को तैयार न हुआ. चिंतामणि की दीवानगी इस कदर हावी थी की वो तुरंत ही नदी में कूद गया और डूबने लगा तो एक लकड़ी का सहारा मिला जिसे पकड़ के हो नहीं पार करने में सफल होने लगा. 

लेकिन जिसे उसने (लकड़ी का) लट्ठा समझ के पकड़ा हुआ था वो असल में एक लाश थी जिसे वो कोठे तक ले गया. तेज बारिश जारी थी और चिंतामणि नींद में सो रही थी न उसे दरवाजे की खटखटाहट नहीं सुनाई दी, तो बिल्वा मंगल ने छत से लटक रही एक रस्सी जो की एक सांप था पकड़ी और छत पे चढ़ गया. 

बिल्वा के कपडे पुरे फट चुके थे और उसके शरीर से मृत शव की बांस आ रही थी उसकी हालत देख चिंतामणि चीख उठी पर जब उसने उसे पहचाना तो बारिश रुकने पर लालटेन लेके उसके साथ निचे गई तो क्या देखती है की रस्सी जिसके सहारे मंगल छत पे चढ़ा तो वो एक जहरीला सर्प है और लट्ठे की जगह एक लाश पड़ी है जिसका आभास बिल्वा मंगल को भी तभी हुआ. 


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इस पर वैश्या ने उसे खरी खोटी सुनाई "तुम मेरे इस हाड़ मांस के शरीरी पर इतने मोहित हो की अपने पिता की मौत के दिन भी मिले बिना न रह सके और लाश और सांप के सहारे भी मुझ तक पहुँच गए इतनी तल्लीनता तुमने अगर श्री कृष्ण के प्रति रखी होती तो तुम्हारा कल्याण हो गया होता". 

उसी क्षण बिल्वा मंगल का चैतन्य ज!ग और वो चिंतामणि के पैरो में गिर कर कहने लगा की तुमने मुझे सही रास्ता दिखाया है तुम मेरी गुरु हो, ये कह कर बिल्वा मंगल तुरंत ही कृष्ण जाप करते हुए उनकी खोज में दीवानो की तरह घूमने लगा. एक दिन एक सुन्दर ग्रामीण महिला को देख कर वो मोहित हो गया और उसके पीछे चल दिया पर घर के बाहर बैठ. 

थोड़ी देर में उसका पति आया तो बिल्वा ने उसे पूरी बात कह सुनाई की मैं उस औरत को फिर से देखना चाहता हूँ, सेठ ने इसमें कुछ गलत न जान अपनी पत्नी को बुलाया उससे पहले ही मंगल को अपना अपराध बोध हुआ और उसने दोनों पति पत्नी के सामने ही एक लकड़ी उठाई और अपनी दोनों ऑंखें फोड़ ली. 

दोनों पति पत्नी देखते ही रह गए पर बिल्व मंगल ने ये सोच कर ऐसा किया की ऑंखें उसे कृष्ण से दूर कर रही है और वो कृष्ण नाम रटते हुए गिरते पड़ते गांव गांव भटकने लगा.


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तब अँधा हुआ बिल्वा भूखे प्यासा भटकने लगा, तब भगवान कृष्ण ग्वाले के रूप में आये और उससे बोले की मैं तुम्हारे लिए मिठाई और पानी लाया हूँ इसे खालो, अपने परिचय पूछे जाने पर कृष्ण ने कहा की में एक ग्वाला हूँ पर लोग मुझे अलग अलग नामो से पुकारते है,मैं रोज तुम्हारे लिए अच्छा खाना लेके आऊंगा. 

ऐसा कुछ दिन तक चला तब एक दिन कृष्ण ने कहा की चलो वृन्दावन चलते है पर बिल्वा ने अंधत्व के कारन असमर्थता जताई, इस पर कृष्ण ने कहा की मैं तुम्हारी लाठी पकडे चलूँगा तुम पीछे चलते रहना. दोनों तब चल दिए, जब वृन्दावन आया तो कृष्ण (ग्वालरूप में) ने जाने की आज्ञा मांगी तो मंगल बिल्वा ने उनका हाथ पकड़ा. 

हाथ पकड़ते ही उसके शरीर में बिजली दौड़ पड़ी और वो पहचान गया की ग्वाला और कोई नहीं बल्कि स्वयं प्रभु है, उसने कृष्ण का हाथ कस कर पकड़ लिए और बोला अब में आपको पहचान गया हूँ और आपको नहीं छोड़ सकता. तब कृष्ण ने अपना दूसरा हाथ मंगल की आँखों पे रखा और उसकी दृष्टि लौटा दी. 

फिर ऐसे ही कृष्ण कृष्ण रटते हुए मंगल बिल्वा की जिंदगी निकली और परमधाम को प्राप्त हुए. जय श्री कृष्णा 

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