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11 महीने लंका में : राक्षसिया चाटती थी सीता जी को, नाखुनो से कुरेदती थी उनकी चमड़ी...

"अत्रि ऋषि की पत्नी सती अनुसूया ने वनवास के दौरान सीता जी से खुद पतिव्रता धर्म कहा और फिर कहा की सीता तुम तो पतिव्रताओ में श्रेष्ठ हो, कलियुग में तुम्हारा नाम ले"
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"सीता को राम जी ने त्याग दिया..." ये फर्जी आरोप लगाकर देश की आजादी के बाद सेकुलरो ने न सिर्फ राम जी को बदनाम किया बल्कि सीता जी के त्याग को भू भुला देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. असल में राम जी ने सीता का त्याग किया ही नहीं था बल्कि खुद सीता ने कैकयी के जैसे वरदान का फायदा उठाते हुए वनवास गमन चुना था.

राम जी को जब पहली बार पता चला की वो पिता बनने वाले है तो उन्होंने सीता जी को एक वर मांगने के लिए कहा था. बाद में मांग लुंगी कह कर सीता जी ने तब कुछ नहीं माँगा लेकिन जब उन्होंने राम जी के दोस्तों को ये कहते सुना की प्रजा में एक धोबी सीता जी पे आक्षेप लगा रहा है तो सीता जी आहत हो गई.

एक राजवंशी होने के चलते वो राजधर्म जानती थी, प्रजा में से कोई अगर झूठा भी राजा पर कोई लांछन लगाए तो ये रघुकुल की मर्यादा के खिलाफ था. वो धोबी और उसकी पत्नी असल में पूर्व जन्म के तोता-तोती जिन्हे बचपन में सीता जी ने कष्ट दिया था और उन्होंने उन्हें पति से अलग रहकर बच्चे पैदा करने का श्राप दिया था.

इसी के चलते सीता जी ने राम जी से वरदान के रूप में खुद वनवास माँगा गया था इसलिए राम जी विवश हो गए थे, ये तथ्य अगर आप मानते है तभी आपको पढ़ने चाहिए सीता जी के लंका में उठाये गए कष्टों के बारे में...


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धोखे से हरण के बाद रावण सीता जी को पहले अपने महल (मलेशिया-इंडोनेशिया) ले गया था वंहा उसने चकाचौंध दिखाकर सीता को मान जाने को कहा लेकिन सीता जी ने उसकी तरफ देखा भी नहीं. तब वो उन्हें अशोक वाटिका ले गया जंहा उसने राक्षसियो को उन्हें प्रताड़ित कर मनवाने को कहा था.

सीता जी ने वंहा अन्न जल त्याग दिया था और अनशन से प्राण त्यागना चाहती थी लेकिन उसी रात इंद्र आये और उन्हें राक्षसों के अंत का निमित बताया. विश्वास होने पर उन्होंने दिव्य खीर खाई जिससे भूख से उनके प्राण नहीं गए, पतिव्रत धर्म के अनुसार सीता जी ने स्नान करना भी छोड़ दिया और पैरो में सर रख दिनरात रोटी रहती थी.

श्रीलंका की लोक मान्यताओं के अनुसार उनके (सीता जी के) आंसुओ से बना तालाब आज भी वंहा मौजूद है जिसका पानी कभी ख़त्म नहीं होता है. 


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नहाती नहीं थी इसलिए उनके शरीर पर मेल जम गया था, जब जब रावण आता था उससे पहले राक्षसिया उनके बदन को अपने नाखुनो से कुरेद कर साफ़ करती थी और जीभ से चाटती थी. वो अपने लम्बे दांतो को दिखाकर तो कभी अपनी लार सीता पर टपका कर उन्हें डराती थी.

जिस दिन हनुमान जी लंका पहुंचे थे सीता जी से मुलाकात की थी उस दिन ही सीता जी ने त्रिजटा के साथ मिल आत्महत्या की तैयारी कर ली थी. अगर हनुमान उस दिन न पहुंचे होते तो उसी दिन रामायण समाप्त हो चुकी होती, इसलिए रामायण में सुन्दर काण्ड का सबसे ज्यादा महत्त्व है.
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