भगवान् नहीं, भक्त पूजित करवाते है भगवान् को चमत्कार को लोग करते है नमस्कार

"जैसे एक ही माँ के बेटे अलग अलग प्रतिष्ठा प्राप्त करते है वैसे ही एक ही तरह की दिखने वाली पत्थर की मूर्ति बनवा लो लेकिन पूजित वही होगी जिसे भक्त ने पुजवाया....."

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सनातन संस्कृति में मूर्ति पूजा का काफी महत्त्व है भले ही इसपे मध्यकाल में कई सेक्युलर चिंतको ने आवाज उठाई थी और इसे त्यागने की सलाह दी थी लेकिन असल में वो मूर्ति पूजा ही है जिसके चलते हम आज भी आस्तिक है और भगवान् को मानते है नहीं तो हम भी नास्तिक बन चुके होते.

उदाहरण के तौर पर भूत प्रेतों को ही ले लीजिये, इनके अस्तित्व को कोई नकार नहीं सकता लेकिन सेक्युलर वैज्ञानिक प्रमाण मानते है और उनके अस्तित्व को नकारते है. अगर मूर्ति पूजा नहीं करते होते हम तो भगवान् के विषय में भी ऐसा ही कहते सेक्युलर और जैसे प्रेतों के अस्तित्व को आज आधा भारत नहीं मानता, भारत में भी आधे नास्तिक हो चुके होते.

एक और उदाहरण इस नास्तिकता के दुरूपयोग का है आतंकवाद, इस्लाम में मूर्ति पूजा नहीं होती और शायद ये ही कारण है की धर्म गुरु अनुयाइयों को बरगलाकर उन्हें आतंकवादी बना देते है जन्नत के झूठे सपने दिखाकर. 

भगवान् तो भक्ति और भाव के भूखे है लेकिन वो भाव तभी आते है जब हम उनकी साकार रूप में कल्पना करे. वैसे मूर्ति पूजा भगवान् ने नहीं भक्तो ने ही शुरू करवाई है, जाने मूर्ति पूजा के पीछे का विज्ञानं और भक्तो के प्रभाव का मूर्ति पूजा प्रसंग में वर्णन.....


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मनोवैज्ञानिक ये मानते है की निराकार वस्तु को आप ज्यादा समय तक याद नहीं रख सकते है और ना ही आपके दिल में उसके लिए कोई भाव प्रकट होते है. मन ही है जो आँखों से देखता है अगर मन में कोई कल्पना ही नहीं होगी तो भाव ही प्रकट नहीं होंगे ये ही बात गीता में श्री कृष्ण ने कही है.

जैसे मंदिर में होने पर अधिकतर लोग अपराध से बचते है वैसे ही घर में भी देव प्रतिमा हो तो लोग उनके सानिध्य में कुछ गलत कहने बोलने करने से झिझकते है. ऐसे आपकी आस्था बढ़ती ही जाती है और आस्था से भाव और भक्ति बढ़ती है जिससे आप में सतगुणो का संचार होता है.

दूसरा ये ही तर्कों के चलते भक्त ही भगवान् की साकार रूप में पूजा करते आये है और उन्होंने ही शुरू की थी करवानी. उन्ही के चलते शिव स्वम्भू होकर 12 जगह ज्योतिर्लिंगों के रूप में स्वयं प्रतिष्ठित हुए थे, जो शक्ति पीठ है वो सभी देवी के अंगो के गिरने से बने है.

इसके आलावा जो भी प्रमुख मंदिर है वंहा भक्तो ने भगवान् को पूजित करवाया और उनको स्थापित कर पूजा आरम्भ की इसलिए आज वो स्थान नामी है. वैसे इस्कॉन संस्था भी ऐसी ही है जिसने वेस्ट में भी कृष्ण भक्ति का प्रचार किया और इसलिए उनके मंदिरो में भी भीड़ देखि जाती है....

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