पिछले जन्म में हुए विवाह के बंधनो से मुक्ति दिलाती है सप्तपदी, जाने भारतीय शादी को...

"जो अनादि काल से चला आ रहा है उसे सनातन कहते है, भारतीयों का कोई धर्म नहीं है बल्कि सनातन परम्पराओ का निर्वहन करना ही हमारा धर्म है. विदेशी आक्रमणकारियों ने....."

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जिसकी शुरुवात कब हुई ये पता नहीं होता है उसे सनातन कहते है, भारतीयों का कोई धर्म नहीं है बल्कि परम्पराओ का निर्वहन करना ही हमारा धर्म है. मुघलो ने सिंधु नदी पार कर भारत में प्रवेश किया वो हमें सिंधु कहते थे लेकिन वो उच्चारण में स को ह बोलते थे इसलिए भारतीय हिन्दू कहलाने लगे हिन्दू इसलिए एक समूह है.

भगवान् उमाशंकर की शादी जिन परम्पराओ में हुई उसी परम्परा में लगभग आज भी हम शादिया आयोजित करते है. इस दौरान बहुत से रस्मे निभाई जाती है जिनको हम युगो से निभाते आ रहे है लेकिन अगर कोई पंडित से पूछ ले की ये क्यों ऐसे क्यों तो वो भी जवाब नहीं दे सकता तो आप कैसे दे सकते है.

राजनीती में तर्क वितर्क होते है धर्म में नहीं लेकिन कई ऐसी परम्पराये जो आज भी हम निभाते है उनका अर्थ शायद आपको मालूम हो तो आप गदगद हो जाएंगे. जैसे के मंदिर की घंटी को ही लेले, इसे बजाने पर 7 सेकंड का कम्पन होता है, वैज्ञानिको के अनुसार इतने समय में इस कम्पन से मस्तिष्क के 7 द्वार खुल जाते है तो पूजामे ध्यान अच्छा लगता है.

जाने ऐसे ही कुछ रिवाज और उनके पीछे के तर्क जो आपको गौरवान्वित करेंगे...


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सप्तपदी परम्परा विवाह संस्कार का अंतिम अंग होती है जो की भारत में ही अलग अलग तरह से निभाई जाती है, कई 7 सुपारी चावल के ढेर पर रखी को दुल्हन से छुवाते है तो कई कुमकुम से पेअर भर दुल्हन से पैर बनवाते है. राजस्थान में 7 थालियों को दुल्हन से बटोरवाते है जिन्हे दूल्हा पहले इधर उधर करता है.

असल में ऐसा करने के पीछे की मान्यता है की इससे दुल्हन के पिछले जन्म की शादी के सभी बंधन खुल या टूट जाते है अगर ऐसा नहीं करते तो पूर्व जन्म के पति में उसका अनुराग इस जन्म में भी हो सकता है और घर में कलह हो सकती है. गौर हो की शादी को सात जन्मो का बंधन भी इसलिए कहते है...

जाने ऐसी ही कुछ और भी परम्पराये....


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जिनकी शादी तय हो जाती है और विवाह के संस्कार शुरू हो जाते है ऐसे वर वधु पर नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा आकर्षित होते है और उनके शरीर पर कब्जा करने की कोशिश करते है. हल्दी लगाने से ऐसी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है की ऐसी बाधाएं भाग खड़ी होती है.

विनायक पूजा से ही विवाह के शुरुवात होती है क्योंकि वो विघ्नेश है, अगर उनसे शुरुवात न करे तो वो विघ्न पेश करते है. बिना जनेऊ के कोई भी धर्म कार्य का फल नहीं मिलता इसलिए कन्यादान करने वाला पिता अंत्येष्टि कर्म में पुत्र और विवाह से पहले दूल्हे को जनेऊ पहननी ही पड़ती है.

तो हमारी परम्पराओ को मजाक समझ उन्हें इग्नोर न करे और हंसी में न उड़ाए....

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