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बाकि धर्मो से अलग है सनातन में कच्ची उम्र के अंतिम संस्कार, जानना जरुरी है...

"सनातन में हर मनुष्य के जीवन में सोलह संस्कार बताये गए है (ब्राह्मणो के लिए 32) जिनके पुरे होने का एक निश्चित समय या पड़ाव होता है लेकिन अगर कोई बालक असमय चल बसे"
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घर में किसी बच्चे की मौत हो जाए तो ये सबसे बड़ा मातम है क्योंकि बुजुर्ग की मौत तो स्वाभाविक ही है लेकिन एक बच्चा क्यों मर गया ये एक सोचनीय विषय है. वैसे तो हम सभी यंहा अपने कर्मो का फल भोगने आते है और जीवन मृत्यु पहले से तय होती है लेकिन अपनों का ये कर्तव्य है की वो अपने निज जनो का अंतिम संस्कार पूरी श्रद्धा से और धार्मिक रीती से करे.

बाकि धर्मो में (ईसाई और मुस्लिम) शव को दफनाने का ही विधान है चाहे वो बच्चा हो या बुजुर्ग, लेकिन अगर आपको ये लगता है की हिन्दुओ में भी बच्चो के दफनाने का ही विधान है तो आप गलत है. हिन्दू धर्म में सोलह संस्कार के बारे में आपने सुन रखा होगा, असल में इन संस्कारो पर निर्भर करता है अंतिम संस्कार.

गर्भादान से लेकर आठवे महीने तक कई संस्कार माँ के गर्भ में ही हो चुके होते है लेकिन इन्ही संस्कारो के बिच अगर गर्भ स्त्राव या गर्भपात हो जाए तो ऐसे गर्भस्थ शिशु के शव को दफना देना चाहिए उसके लिए फिर कुछ भी नहीं करना चाहिए. लेकिन जन्म से लेकर चूड़ाकरण संस्कार या दांत आने तक किसी बच्चे की मृत्यु हो जाए तो अंतिम संस्कार के आलावा कुछ और भी करे.

अगर नहीं करते है या किया आपने तो वो बच्चे 5 साल में बन जाते है पुरुष और....


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ये दुनिया चलती ही रहती है जीवन कभी ठहरता नहीं है, जीवित हो या मृत व्यक्ति उनकी पुनरावृति होती ही रहती है. ऐसे में अगर आप इस बारे में कुछ भी नहीं जानते है तो आपको गरुड़ पुराण पढ़ना चाहिए या पुराण विद से सलाह लेनी चाहिए, जन्म से लेकर 22 महीने तक के बच्चे को शिशु कहते है.

22 महीने के ऊपर और 5 साल तक के उम्र के बिच के बच्चो को बालक तो उसके ऊपर और उपनयन संस्कार होने तक के बच्चो और युवाओ को कुमार कहते है. जन्म से लेकर 22 महीने तक की बच्चे की अगर मृत्यु हो जाए तो उसके शव को दफ़नाने का ही विधान है और कुछ नहीं करना चाहिए.

लेकिन उस शिशु की मुक्ति के लिए उसके निमित बच्चो को दूध पिलाना चाहिए और दूध दान करना चाहिए....जाने उसके बाद के स्तरो को...


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लेकिन 22 महीने से ऊपर और उपनयन संस्कार जिनके नहीं हुए है उस युवा की अगर मृत्यु हो जाती है तो उसे दफनाना नहीं चाहिए बल्कि उसका अंतिम संस्कार करना चाहिए. लेकिन उसके लिए ग्यारहवा बारहवा और महादान नहीं किया जाता है बल्कि उसके निमित पानी और खीर के घटदान करने चाहिए.

ऐसा करने से उसकी मुक्ति का मार्ग खुल जाता है लेकिन उसके बाद बरसी के दिन घड़ा अवश्य भरना चाहिए उसके लिए अन्यथा वो पिशाच बन जाता है. असल में जीवित हो या मृत व्यक्ति बालक हो या वृध्द उसकी उम्र तो बढ़ती ही है लेकिन अगर बालक भी मरे तो उसमे 5 वर्ष के बाद पुरुष्त्व प्रतिष्ठित हो जाता है.

उसके बाद उसे रूप भी मिल जाता है और उसमे समझ भी विकसित हो जाती है, ऐसा होने से और पिशाच बन जाने से वो घर में उत्पात मचता है जिसके फलस्वरूप आपके घर में अकाल मृत्यु, दुःख, क्लेश, पैसे की हानि और दरिद्रता टूट पड़ती है इसलिए बच्चो के अंतिम संस्कार में विशेष सावधानी बरते.
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