अभिमन्यु और उतरा ने राजस्थान में फिर से लिया था जन्म, जाने अलौकिक कथा...

"अगर आपको कर्म को समझना है तो उसके लिए आपको पुराणों में मौजूद कुछ पुनर्जन्म की कथाये पढ़नी होगी बिना इनके पढ़े आप गीता समझ नहीं पाएंगे, पढ़े अभिमन्यु उतरा का पुनर.."

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12 वर्ष के वनवास के बाद तेरहवा वर्ष पांडवो को अज्ञातवास में बिताना था जिसके लिए उन्होंने विराट नरेश की शरण ली थी! सभी पांडवो ने भेष बदलकर वंहा दलितों के रूप में शरण ली थी और यक्ष के वरदान के चलते उन्हें कोई पहचान नहीं पाया था लेकिन अर्जुन उर्वशी के श्राप के चलते एक किन्नर बन गया था.

अर्जुन ने स्वर्ग में उर्वशी से नृत्य सीखा था जिसके बाद उर्वशी उसपे मोहित हो गई थी और समागम का आह्वान किया था लेकिन अर्जुन के पूर्वज पुरुरवा की वो पत्नी रह चुकी थी इसलिए अर्जुन ने उसे माता कह दिया था.  क्रोधित होकर उर्वशी ने उसे एक वर्ष तक किन्नर होने का श्राप दिया था जो उसके इस समय काम आया.

अर्जुन इस दौरान विराट की पुत्री उतरा को नृत्य सिखाता था, अज्ञातवास समाप्ति पर अर्जुन ने विराट को कौरवो पर विजय दिलवाई थी और उसकी गौ वंश पुनः दिलवाई थी. शर्मिंदा होकर बदले में विराट नरेश ने अपनी बेटी उतरा का हाथ अर्जुन के हाथ में देना चाहा था लेकिन वो अर्जुन की शिष्य थी इसलिए अर्जुन ने उसे अपने पुत्र अभिमन्यु के लिए स्वीकार किया था.

उतरा एक सच्ची पतिव्रता नारी थी और उसके पतिव्रत के चलते ही उसने पति सहित पुनः लिया था जन्म...जाने 


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अभिमन्यु का उतरा से विवाह हो गया लेकिन उसके पहले ही उसका विवाह बलराम जी की बेटी वत्सला से तय हो गया था! लेकिन जब पांडवो से राज पाट छीन गया तो रिश्ता टूट गया, ऐसे में घटोत्कच के मायाजाल की मदद से कुछ ऐसा चमत्कार हुआ की वत्सला की शादी अभिमन्यु से ही हो गई.

लेकिन उतरा बड़ी पत्नी थी और उसी की कोख में परीक्षित पलने लगा जब महाभारत का युद्ध चल रहा था, इसी दौरान अभिमन्यु शहीद हो गए. ऐसे वक्त में उतरा अपने पति के शव के साथ सती होना चाहती थी लेकिन उसके 3 महीने के गर्भ में पांडवो का वंश था इसलिए उसे सब ऐसा करने से रोक रहे थे लेकिन वो नहीं मानी.

तब कृष्ण ने उसे कुछ ऐसा कहा जिसके बाद वो दिल पर पत्थर रख कर सती होने से वंचित रही, जाने?


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भगवान् कृष्ण ने पहले तो उतरा को धर्म समझाया, जिसके तहत रजस्वला और गर्भवती स्त्री को सती होने की इजाजत नहीं थी! लेकिन फिर भी उतरा नहीं मानी तो श्री कृष्ण ने उसे आश्वासन दिया की अगले जन्म में तुम्हे में सती होने मौका दूंगा तुम पांडवो के इस वंश की रक्षा करो.

उतरा तब मान गई लेकिन जब अश्वत्थामा ने उसके गर्भ में ब्रह्मास्त्र छोड़ा तो वो कृष्ण को दुहाई देने लगी की आपके कहने पर में रुकी (सती) होने से अब ये पुत्र ही नहीं रहा तो मेरा बलिदान क्या काम आया. तब श्रीकृष्ण ने उसके झुलसे हुए पुत्र को पुनः जीवित कर दिया और उतरा प्रसन्न हो गई.

तब मृत्यु के बाद अगले जन्म में ये ही उतरा और परीक्षित राजस्थान के शेखावाटी में एक वैश्य घर में जन्मे, अभिमन्यु तनधन दास तो उतरा नारायणी के नाम से प्रसिद्द हुई. एक राजा से विवाद के बाद जब तनधन दास मारे गए तो उतरा रूपी नारायणी देवी ने रण में उतारकर उस राजा का वध किया.

बाद में वो पति के शव के साथ सती हो गई और आज रानी सती के नाम से प्रसिद्द है...


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ऐसे श्री कृष्ण ने अपना वचन निभाया तो उतरा ने अपना पतिव्रत वचन निभाकर पति समेत स्वर्गवासी हुई दोनों असल में चंद्र और उनकी पत्नी के ही धरती पर अवतार थे.  

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