चीरहरण के बाद द्रौपदी ने नहीं दिया था पांडवो की संतान को जन्म, जाने ऐसे ही तथ्य....

"द्रौपदी का असली (जन्म का) नाम कृष्णा था, वो अग्नि से प्रकट हुई थी और श्री कृष्ण के जैसे ही सांवले रंग की थी इसलिए कृष्णा नाम रखा गया था! द्रुपद नरेश की बेटी...."

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छायां सीता जो की सीता की जगह रावण द्वारा हरी गई थी और फिर अग्नि परीक्षा के समय फिर अग्नि में समा गई थी उस से बाद में सीता जी ने राम जी से शादी करने को कहा था. राम जी ने तब बना कर दिया और वो ही छाया सीता तब तिरुपति अवतार में भगवान् विष्णु की पत्नी बनी थी.

लेकिन इसके बिच उसने द्रौपदी के रूप में अग्नि से ही जन्म लिया था जिसमे वो देवराज इंद्र की प्रति मूर्तियों (पांडवो) से ब्याही गई थी. कृष्ण के समान ही उसका रंग भी सांवला था इसलिए उसका भी नाम कृष्णा ही था, पांचाल नरेश की बेटी होने से पांचाली और द्रुपद की बेटी होने से द्रौपदी कहलाई थी.

बचपन से लेकर स्वयंवर तक उसे पिता और भाई को छोड़ किसी पराये पुरुष ने नहीं देखा था, वो ही द्रौपदी अपने मासिक धर्म के तीसरे दिन दुस्सासन द्वारा बाल पकड़ कर भरी सभा में खिंच कर लाइ गई थी. उस अबला की तब कृष्ण ने बचाई थी असमत लेकिन इस भयानक घटना के बाद सभी इतने क्षुब्ध थे की वो फिर कभी पांडवो के बच्चो की माँ नहीं बनी.

ये ही कारण था की 5 पुत्रो के मारे जाने के बाद भी पांडवो ने पुत्र प्राप्ति नहीं की और उतारा अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित बना वारिस. जाने ऐसे ही कुछ तथ्य....


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चीरहरण के दौरान जब दुस्सासन कृष्णा को प्रताड़ित कर रहा था तो भीम मजबूरन उसे बचा नहीं पाया था इसी के चलते पांडवो ने कभी द्रौपदी से संतान प्राप्ति नहीं की थी. 

द्रौपदी अपनी सभी सौतनों का भी सम्मान करती थी और उनकी भी पति के समान पूजा करती थी.

शास्त्रों के अनुसार अगर कोई औरत पांच मर्दो से बच्चे पैदा करले तो वो वैश्या ही माने योग्य है लेकिन अगर वो पति सभी भाई है तो विशेष परिस्तिथियों में उनकी शादी हो सकती है 10 प्रचेता भी मारिषा के साथ पहले ऐसा कर चुके है और उन्ही प्रचेताओ के पुत्र ही वाल्मीकि ऋषि हुए थे.

इस तथ्य को न जानकार ही कर्ण ने द्रौपदी को गाय कह कर अपमानित किया था और पांडवो को बैल बताया था. उस काल में बच्चे पैदा करने के लिए ही भोग किया जाता था, अब के समय में 5 मर्दो द्वारा भोगी जानी वाली औरत वैश्या मानने योग्य है लेकिन ऐसा कहना कानूनन जुर्म है.


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द्रौपदी अर्जुन से अधिक प्रेम करती थी जिसके चलते वो स्वर्गारोहण के दौरान सशरीर स्वर्ग नहीं पहुँच पाई थी, लेकिन 5 पांडवो में भीम उससे सर्वाधिक स्नेह करता था. द्रौपदी को दांव पर लगाने पर वो युधिस्ठर पर क्रोधित हो गया था, उसी समय उसने दुस्सासन का खून पिने की प्रतिज्ञा की थी और दुर्योधन की जंघा तोड़ने की भी.

अज्ञातवास के दौरान कीचक को भीम ने मारा था तो जयद्रत का मुंडन भी भीम ने ही किया था जब पाण्डव अपना राज पाट परीक्षित को सौंपकर स्वर्ग के लिए चले। स्वर्ग की यात्रा बहुत ही कठिन और दुःखदायी थी। इस यात्रा के समय भीम ने द्रौपदी का सबसे ज्यादा ध्यान रखा.

स्वर्गारोहण के दौरान नकुल सहदेह मर चुके थे तब द्रौपदी भीम का सहारा लेकर चलने लगी पर द्रौपदी भी ज्यादा दूर नहीं चल सकी और वह भी गिरने लगी। ऐसे वक्त में भीम ने द्रौपदी को संभाला. इसी समय द्रौपदी ने कहा था कि सभी पांचो भाइयो में भीम ने ही मुझे सबसे अधिक प्रेम किया है और मैं अगले जन्म में दुबारा भीम की धर्मपत्नी बनना चाहूंगी. 

इसके कुछ समय बाद द्रौपदी ने भी इन सभी का साथ हमेशा के लिए छोड़ कर चली गयी....

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