दशकों शोध से किसी नतीजे पर पहुँचते है पश्चिम के वैज्ञानिक, फिर कहते है की ये वेदो में पहले से मौजूद...

"युग (12000x) सहस्त्र (1000X) योजन (X12) पर भानु हनुमान चालीसा में जो दुरी सूर्य की धरती से दी है वो ही वैज्ञानिको ने 3 सदियों बाद नापी, इसलिए अब वो वेदो के कदर"

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पृथ्वी से सूर्य की दुरी वैज्ञानिक 146 million किमोमीटर बताते है जो की 1653 में प्रतिपादित हुआ था लेकिन उसके पहले ही तुलसीदास की हनुमान चालीसा में ये दुरी लिख दी गई थी. युग सहस्त्र योजन पर भानु, युग मतलब 12000 सहस्त्र मतलब 1000 और योजन मतलब 12.2 किलोमीटर जिसका गुना करने पर 14.64 करोड़ होता है .

दोनों की दुरी समान ही है मतलब पाश्चात्य के वैज्ञानिको ने वो ही खोजा जो भारत के इतिहास में उससे पहले ही खोज लिया गया था. ऐसे ही भारत के इतिहास (आधात्म यानि इतिहास जो पुराणों वेदो और ग्रंथो में लिखा है) में चंद्र की दुरी हो या पृथ्वी का आकर प्रकार सब बताया हुआ है वो ही खोजै है वैज्ञानिको ने.

आधुनिक कैलेंडर भी भारतीयों ने कभी के खोल रखे है भारत में तो सूर्य ही नहीं चन्द्रमा की गति के आधार पर प्रचलित कैलेंडर आज भी प्रचलन में है. आने वाले सूर्य चंद्र ग्रहण और खगोलीय घटनाएं भारत के ज्योतिषी अंगुलियों पर गईं कर बता दी है जिसे जान स्तब्ध है विदेशी वैज्ञानिक और वेदो के ले रहे है शरण.

जाने कुछ ऐसे ही गौरवान्वित करने वाले तथ्य....


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500 वि ईस्वी में बिहार के नालंदा में विश्व विद्यालय शुरू हुआ था जो कभी दुनिया का पहला कॉलेज था जंहा एशिया के सभी देशो से विधार्थी पढ़ने आते थे. लेकिन 1200 ईस्वी के अंत में भारत में जब तुर्क आये तो क़ुतुबदिन ऐबक के सेनापति बख्तियार ने इसे लुटा और इसको समाप्त कर दिया था.

इस यूनिवर्सिटी को तहस नहस कर दिया गया था जिसमे दुर्लभ 90 लाख किताबे भी थी जो की स्वाहा हो गई और न जाने कितना दुर्लभ इतिहास हमसे दूर हो गया. कुछ विदेशी इतिहासकारो न कहना है की उसी समय की बची कुछ शोध पुस्तकों को ही विदेशी भ्रमणकारी भारत से ले गए और तब शुरू हुए यूरोप में अविष्कार...

आप अंदाजा लगाइये की दुनिया भर में सिर्फ एक ही ऑक्सीजन (प्राणवायु) को जाना जाता है जबकि आयुर्वेद में 10 तरह की ऑक्सीजन के बारे में जिक्र है जो की अलग अलग तरह के काम करती है.


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एक और सिद्धांत ये कहता है की वास्को डीगामा 1500 ईस्वी में भारत आया चौंकाने वाली बात ये है की उसके भारत से जाने के बाद ही यूरोप में जाने की 17 वी सदी की शुरुवात में ही वंहा मुख्य आविष्कार प्रारम्भ हुए थे जो की आज भी क्रन्तिकारी है.

यूरोप में और कुछ भारतीय विद्वान् भी मानते है की वास्को और उसके बाद यंहा आये कुछ पर्यटक भारत से सुश्रुत और उनके जैसे ही विद्वानों और कई और विद्वानों द्वारा लिखी गई शोध पुस्तके ले गए जो की आज भी (नासा में भारत की लिपिया सुरक्षित है) सुरक्षित रखी है.

इनफर्टिलिटी (पांडवो का जन्म), गर्भ स्थानांतरण (बलराम का रोहिणी के गर्भ में), लिंग परिवर्तन (शिखंडी), मर्द का बच्चा पैदा करना (राजा मान्धाता), बुड्ढे का फिर से जवान होना और जवान का बुद्धा होना, दो धड़ो का फिर जीवित होना खून से नए मानव का जन्म आदि आदि उदाहरण हमारे इतिहास में मौजूद है जिसे वेस्ट या तो अब खोज चूका है या खोज लेगा.

ये सब बताते है की हमारा इतिहास कितना गौरवशाली था जिसकी तरफ हमें बढ़ना ही चाहिए....

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