आखिर क्या सूझी तुलसीदास को जो लिख दी अपनी रामायण, जाने अद्भुद घटनाये..

"ब्रह्मा जी की आज्ञा से वाल्मीकि जी ने घटित होने से पहले ही राम जी का जीवन चरित्र रामायण लिख दिया था ऐसे में जब उसकी मौजूदगी में तुलसीदास जी ने 16 सदी में क्यों"

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भगवान अगर होते तो कोई गरीब नहीं होता कोई अपराध नहीं होता फ्ला फ्ला तर्क आप नास्तिको से और एंटी हिन्दुओ से सुनते रहते होंगे लेकिन क्या आप भी इनसे सहमत होंगे. धर्म से दूर है इसलिए आप को इनकी बातो में कोई पॉइंट नजर आता है ऐसा भी हो सकता है लेकिन जाने आखिर भगवान् क्यों नहीं करते मदद और किसकी करते है मदद?

"धर्मो रक्षति रक्षितय" यानी तुम अपने धर्म की रक्षा करो तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा, जाती के अनुसार जो धर्म आपको शाश्त्रो में बताया गया है उसपे अमल करो तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा. इस जन्म में भगवान् उसी की मदद करता है जो या तो उनका अनन्य (अँधा विशवास करता है) या फिर जो धर्म पर चलता है उसकी.

इसके अलावा अगर आपका आस्था के चलते मंदिर जाते है दानपुण्य करते है तो उसका फल आपको अगले जन्म में मिलेगा इसमें तभी जब आपके पाप पुण्य का संतुलन शून्य हो. अगर आपको इस तर्क पर यकीन करना है तो आपको कुछ लोगो की पूर्व जन्म की कहानिया जाननी चाहिए.

संत तुलसीदास पूर्व जन्म में दिति पुत्र मरुद्गण थे जिनके देवत्व को स्थिर करने के लिए ही उन्होंने धरती पर तुलसी रूप में अवतार लिया था....


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जी हाँ, 49 तरह की जो वायु है वो ही मरुद्गण है जिन्होंने ही धरती पर जन्म लिया रामबोला के रूप में! जन्म से ही वो बोल उठे और पहला शब्द ही बोलै राम इसलिए नाम भी रखा रामबोला. उनके मुंह में 32 दांत जन्म से ही थे और इसीलिए वो पत्नी से अपमानित होकर तीर्थ यात्रा पर निकल गए और ब्रह्मज्ञान पाया.

लेकिन काशी में निवास के दौरान स्वयं शिव उनके स्वप्न मे आये और उन्हें रामायण लिखने को कहा जो की उन्हें हनुमान जी ने सुनाई थी. तब उन्होंने रामायण का निर्माण शुरू किया और ऐसे खड़ी बोली की रामायण लिखी गई थी लेकिन इसकी स्वीकार्यता करवाना भी आसान नहीं था.

पाखंडी पंडितों ने श्री राम चरित मानस को परीक्षा पास करने की बात कही, उन्होंने भगवान काशी विश्वनाथ के मंदिर में सामने सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रों के नीचे पुराण और सबसे नीचे तुलसी कृत रामायण रखी। मंदिर बंद कर दिया गया, सुबह जब मंदिर खोला गया तो सभी ने देखा कि श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है। 

यह देखकर पंडित लोग बहुत लज्जित हुए, उन्होंने तुलसीदासजी से क्षमा मांगी और श्रीरामचरितमानस के सर्वप्रमुख ग्रंथ माना।

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