चित्रकूट में आखिर भरत जी ने क्यों कहा " मैं स्वार्थी हो गया था..." जाने?

"रामायण पहले संस्कृत में लिखी थी तो कम लोगो को ही समझ आती थी तब तुलसीदास जी ने इसे खड़ी बोली में लिखा तो ये प्रचलित हो गई लेकिन अब हिंदी में आ गई है फिर भी भारत"

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सुनकर भले ही आप अचरज में और गुस्से में हो लेकिन अगर आपने वाल्मीकि रामायण या तुसली रामायण पढ़ी हो तो आपको इस क्रोध का एहसास नहीं होगा और उलटे आप इस सत्य की अनुभूति करके गदगद हो जायेंगे. रामायण में  मुख्य रूप से राम जी और हनुमान जी के ही चरित्र को लोग जानते है लेकिन सीता जी और भरत आदि के चरित्र भी उनसे कम नहीं थे.

भले ही गिनती में चार थे लेकिन एक ही दिव्य खीर से पैदा हुए भाई दशरथ पुत्र असल में भगवान् विष्णु के अवतार थे और उनमे से किसी को भी कम ज्यादा नहीं आंका जाना चाहिए. हनुमान जी को भी श्रीराम ने कहा था की "तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई" यानी तुम भी मेरे उतने ही प्रिय हो जितने भरत है.

परिवार धर्म, राजधर्म, पति-पत्नी धर्म, भाइयो का धरम, सेवक का धर्म, शरणागत धर्म आदि आदि दर्जनों धर्म जिसे गीता कहते है को सोदाहरण समझना है तो रामायण जरूर पढ़े. भरत की अनुपस्तिथि में जब राम जी को वनवास हुआ और वो लौटे तो राज्य अस्वीकार कर दिया और राम जी को लौटने और वन में ही उनका राज्याभिषेक करने वो चित्रकूट पहुँच गए.

वंही पर अंत में जब राम जी ने उन्ही पर सब छोड़ दिया तो उन्होंने कहा की "मैं स्वार्थी हूँ", जाने क्यों उन्होंने कहा ऐसा?


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चित्रकूट पहुँचने के बाद सब तर्क वितर्क हो चुके थे न रामजी मान रहे थे और न ही भरत जी, ऐसे में फैसला कैसे हो! तब भरत जी वंही धरने (अनशन) पर बैठ गए थे, तब राम जी ने भरत जी से कहा की "भाई, मैंने तुम्हारा क्या अहित किया है तुम क्यों मेरे धर्म के बिच में बाधक बन रहे हो?"

तब भी भरत जी ने जिद नहीं छोड़ी तो राम जी ने खड़े होकर कहा की "ठीक है, मैं अपना धर्म भरत पर छोड़ता हूँ, भरत जो कह देंगे मैं वो ही करूँगा" मतलब अगर भरत कह दे की मेरा वनवास जाना उचित नहीं है तो मैं अयोध्या लौट चलुगा, तब भरत ने अनशन तोडा और पूरी सभा के सामने रट हुए कही ये बात...

"मैं स्वार्थी हो गया था, असल में जो राम जी कर रहे है उनके स्थान पर मैं होता तो वो ही करता! लेकिन दुनिया मुझ पर लांचल लगा रही थी की भरत के मन में राज गद्दी का मोह होगा इसलिए माँ कैकयी ने उनके लिए राज्य माँगा है जबकि मैं इन सब बातो से अनजान था."


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इसलिए अपने ऊपर के आरोपों को गलत साबित करने के लिए ही मैंने ये सब किया, भाई राम वनवास जाये लेकिन मैं भी 14 वर्षो तक नंदी ग्राम में वनवासी के रूप में ही अयोध्या का राज सम्हालूँगा, राम खड़ाऊ ही राज करेगी अयोध्या की गद्दी पर भरत नहीं.....

भरत जी ने इतना कहा और बिलख पड़े और राम जी को दंडवत प्रणाम किया, राम जी ने भाई को उठाकर ह्रदय से लगा लिया और खुद भी रोने लगे. इसी को भरत मिलाप कहते है जिसकी झांकी को कोई विरला ही समझ सकता है, हर हर महादेव.

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