रावण और कंस से भी भयंकर राक्षस हुए है पुराण वर्णित भारतीय इतिहास में, जाने उनकी ताकत

"दशहरा और कंस वध उत्सव से हम बुराई पर अच्छी का जित का जश्न मनाते है लेकिन उनसे भी भयंकर दानव हमारे इतिहास में हुए है जिनके बारे में पुराणों में लिखा है, जाने...."

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वैसे तो अपने रामायण और महाभारत में बहुत से असुर, दानव और राक्षस टीवी पर देखे और सुने होंगे लेकिन क्या आप जानते है की रावण और कंस से भी भयंकर राक्षस भारतीय इतिहास जो की पुराण में लिखा है में मौजूद थे. वैसे अगर आपको असुर दानव और राक्षसों के नाम से कुछ असमंजस है तो इसे हम दूर कर देते है.

कश्यप ऋषि की पत्नी दिति से जन्मे बच्चे और उनके वंशज दैत्य कहलाये, ऐसे ही दनु के पुत्र दानव कहलाये! समुद्र मंथन में  जो सुरा निकली थी उसे जिन्होंने अपनाया वो सुर और जिन्होंने नहीं अपनाया वो असुर कहलाने लगे, इन सभी को उपमा के तौर पर राक्षश की उपाधि भी दी जा सकती है (शायद दी गई).

रावण जन्म से ही दशग्रीव था और बड़ा काला और विकराल दीखता था ऐसे ही कुछ कुम्भकर्ण था वंही कंस भी अपने पूर्व जन्म में कालनेमि राक्षस था जो फिर विष्णु के हाथो मरने के लिए ही जन्मा था. आज जाने ऐसे और भी भयंकर राक्षशो और उनकी शक्तियों को जो आपको चौंका देंगे...


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अपनी ही पत्नी के कोख से जन्म लेने वाला संसार का एकमात्र पति, राक्षस रम्भ का दूसरा जन्म था जिसका नाम रक्तबीज पड़ा. जो की रावण और कंस से भी भयानक दानव था, उसी के चलते देवो पर दैत्य भारी पड़ गए यंहा तक की त्रिदेवो को भी भाग कर छुपना पड़ा था.

उसकी विशेषता थी की उसके रक्त की जंहा बून्द गिरती वंही उसके समान एक और दानं उसके रक्त से प्रकट हो जाता था मतलब उसका रक्त ही उसका बीज था ऐसा उसे वरदान था. तब माँ काली प्रकट हुई और जैसे ही माँ दुर्गा रक्तबीज पर प्रहार करती वो उसकी रक्त की बूंदो को पी जाती थी.

ऐसे करते उसका जब समस्त रक्त समाप्त हो गया तो जाकर वो मारा गया अन्यथा वो अवध्य था.....उसी का पुत्र और भाई दोनों महिषासुर था जो की भी महिला के हाथो मारा जाना था और दुर्गा माँ ने उसका तब वध किया था....


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ब्रह्मा से वरदान पा एक दानव जिसका नाम था अनलासुर था सम्पूर्ण लोकों में उत्पात मचाने लगा, वो अग्नि पर काबू पा चूका था और वरदान ये था की पहली कभी न हुआ इस तरीके से मारा जाऊं. जब तीनो लोको में हाहाकार हुआ तो भगवान गणेश को सबने आगे किया की आप ही उनकी मौत का रास्ता खोजो.

श्रीगणेश दुष्ट दानव से युद्ध करने गए और हर प्रकार से उसे मरने की कोशिश की, तब दानव गणेश को असमर्थ जान उनका उपहास उड़ने लगा. ऐसे में जब गणेश को कुछ न सुझा और अत्यंत क्रोध आया तो वो उस दानव को हाथो में उठा लिए और बेहद वृहद रूप धार लिए.

अपने मुख को बड़ा कर गणेश ने उस दानव अनलासुर को निगल लिया, सभी देव उनकी जय जय कर करने लगे...


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नरसिंघ अवतार कितने भयावह थे ये आप ऊपर की झांकी से समझ सकते है लेकिन जिसे उन्होंने मारा वो कितने खतरनाक थे ये भी जाने. हिरण्याक्ष बड़ा था दोनों में जिसने पृथ्वी पर 1.7 करोड़ वर्षो तक शासन किया था जिसके बाद उसने पृथ्वी को ही जल में डुबो दिया था.

उसे वर था की कोई वराह ही उसका वध करे इसलिए उसने पृथ्वी को डुबोकर उसके जन्म की सम्भावना ही ख़त्म करनी चाही थी तब वराह अवतार ने उसका वध किया. वंही हिरण्यकषायु ने भी 40 लाख वर्षो तक राज किया था उसे भी तब वरदान के अनुरूप नरसिंघ ने मारा लेकिन उसके पहले उन्होंने अकेले उसकी पूरी सेना को भी निपटाया था.


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भगवान् विष्णु जब योग निंद्रा में सोये थे तब उनके कान के मेल से दो दानव मधु और कैटभ जन्मे थे जो ब्रह्मा जी को मारने को दौड़े थे. तब भगवान् विष्णु ने उनके साथ युद्ध किया और युद्ध 5000 साल तक चलता रहा लेकिन दोनों को विष्णु परास्त न कर सकते थे.

तब मोहमाया ने उनकी बुद्धि भ्रमित की और दोनों ने विष्णु जी के पराक्रम पर प्रसन्न हो उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा, मेरे हाथो मारे जाओ ये वरदान माँगा विष्णु ने तो उन्होंने एक शर्त पर दिया की उस स्थान पर मारो जंहा पृथ्वी जल मग्न न हो! प्रलय में तो पृथ्वी जलमंग ही होती है ऐसे में उनका मरना असंभव था.

तब शेषशायी भगवान् ने अपनी जांघो पर उनका सर रख उनका वध किया था, थे न सभी भयंकर?

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