श्रापित अप्सरा थी इस दानव की माँ, दिन में औरत तो रात में भैंस बन जाती थी! पति को भी पेट में...

"ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्रो और प्रजापतियों की रचना की जिससे श्रिष्टि आगे बढ़ सके, उनके द्वारा रचे गए प्रजापतियों में से एक थे दक्ष जिनकी पुत्रियों से कश्यप ऋषि"

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अपने आध्यात्मिक कथाये तो बहुत से सुनी होगी लेकिन मार्कण्डेय कृत पुराण अगर आपने पढ़ा हो जिसका संक्षिप्त भाग दुर्गा सप्तशती में मौजूद है अगर आपने नहीं पढ़ी तो आपने काफी कुछ मिस कर दिया. इस पुराण में ऐसी भयंकर कथा जो की भले ही आपको कल्पित लगे लेकिन उनकी निशानिया आज भी मौजूद है.

एक वरदान के चलते कैसे कैसे समायोजन करने पड़ते है देवताओ को उसका भी इसमें लेखा जोखा है, जैसे इक्ष्वाकु वंशीय मान्धाता ने दिव्य जल पि लिया था और उसके चलते उन्हें बच्चे को जन्म देना पड़ा था वैसे ही ये कहानी भी काफी अद्भुद है और वरदान के चलते हुआ एक भयंकर राक्षस का प्राकट्य.

ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्रो और प्रजापतियों की रचना की जिससे श्रिष्टि आगे बढ़ सके, उनके द्वारा रचे गए प्रजापतियों में से एक थे दक्ष जिनकी पुत्रियों से कश्यप ऋषि का विवाह हुआ था. उनमे से ही एक थी दनु जिनके पुत्र दानव कहलाये, उनके पुत्रो में से दो रम्भ और करम्भ हुए जो की माँ के कहने पर पाताल छोड़ के पृथ्वी पर तपस्या करने के लिए आये थे.

लेकिन.......


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रम्भ ने अग्नि की तो करम्भ ने वरुण देव की तपस्या शुरू की, करम्भ पानी आधा शरीर दुबे तपस्या कर रहा था तो रम्भ अग्नि के बीच में बैठ के. उनके इरादो से परेशान हो इंद्र ने करम्भ को मगर का रूप धार मार डाला, लेकिन रम्भ अपनी तपस्या पूरी करने में सफल हुआ था. 

रम्भ ने अग्नि देव से एक ऐसा बलशाली पुत्र माँगा जो की अत्यंत बलशाली हो और तीनो लोको पे राज कर सके, अग्नि देव ने वैसा ही वरदान दिया. जब रम्भ वर पा के  लौट रहा था तो रस्ते में उसे एक सुन्दर राजकुमारी दिखी जिसपे उसका दिल आ गया और उसने उससे विवाह की इच्छा भी जता दी जिसे राजकुमारी महिषी ने मान भी ली.

राजकुमारी महिषी एक श्रापित देवी थी जिसे की अपने बुरे कर्मो से श्राप मिला था की वो दें के आधे समय में भैंस और आधे समय में औरत बनी रहेगी. दोनों का प्रेम परवान चढ़ा और महिषी जल्द ही गर्भवती हो गई, लेकिन उनके प्यार में रोड़ा बना महिष नाम का एक देव जो की महिषी को दिल दे बैठा था.


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महिष ने महिषी का बलात्कार करना चाहा लेकिन तब रम्भ उनके बचाव में आया दोनों में युद्ध हुआ और महिष ने रम्भ को मार डाला और महिषी को बंदी बना लिया. जब रम्भ का अंतिम संस्कार दिखने महिष महिषी को लाया तो वो हाथ छुड़ा के उसकी चिता में कूद पति थी.

रम्भ के अग्नि देव के वरदान को सिद्ध करने के लिए यमराज उसके प्राण न ले जा सका और महिषी को चिता से सकुशल बाहर निकाल लिया, जब महिषी न मानी तो यमराज ने रम्भ की आत्मा को उसके (महिषी) ही के गर्भ में प्रत्यापित कर दिया. अब बाप और बेटे दोनों एक ही कोख में पल रहे थे. 

पिता और पुत्र ने एक ही दिन जन्म लिया, माँ महिषी ( संस्कृत शब्द जिसका हिंदी अर्थ भैंस) और पिता असुर के मेल से महाबली दैत्य महिषासुर का जन्म हुआ. वंही अपनी ही पति के कोख से जन्म लेने वाला संसार का एकमात्र पति रम्भ का दूसरा जन्म भी हुआ जिसका नाम रक्तबीज पड़ा.


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महिषासुर ने ब्रह्मा की तपस्या कर अपार बल और किसी भी पुरुष के हाथो न मारे जाने का वर पाया और तीनो लोको का अधिपति बन बैठा, यंका तक की सूर्य इंद्र चन्द्र वरुण जल देव की शक्तियों पर भी न अधिकार कर लिया. वंही उसका पिता और भाई रक्तबीज ने वर पाया की उसकी रक्त की बून्द धरती पर गिरते ही वैसा ही बलि उसका प्रतिरूप प्रकट होगा.

ऐसे में दोनों अमर स्वरूप हो गए, तीनो देव भी उनका कुछ न बिगड़ सकते थे साथ ही उनके पास अरबो की असुर सेना भी थी तब सब देव एकत्र हुए और सबने अपनी शक्तियों से माँ दुर्गा का निर्माण किया. सब देवो की शक्ति से बनी दुर्गा ने हजारो अरबो की असुर सेना और समस्त राक्षसो का संहार कर इस संसार को मुक्ति दिलाई थी!

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