वाराणसी के इस घाट पर भगवान् विष्णु ने की थी तपस्या, जाने यंहा पिंडदान का महात्यम

"वरुणा और असि नदी इसी दो और से रक्षा करती है इसलिए शिव नगरी को वाराणसी कहते है ऐसे ही हर घाट की घटना से पड़ा है नाम लेकिन मणिकर्णिका का माहात्म्य वर्णन नहीं किया"

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हमारे शाश्त्र जो की हमारा इतिहास है उनके हर अंक में वरुणा+असि नदी जिसकी रक्षा करती है उस नगर वाराणसी (बनारस और काशी भी) के बारे में बताते है की ये प्रलय में भी नष्ट नहीं होती है. आपको जानकार आश्चर्य होगा की पूरी दुनिया काशी को सबसे पुराना शहर मानती है, भले ही 5000 पुराना ही मानो पर मानती है.

काशी में वो ही जा सकता है जिसे शिव जी बुलाये या आज्ञा दे अन्यथा नहीं जा सकता कोई, जिस में प्राण छोड़ने वाले के कानो में स्वयं शिव मुक्ति का मन्त्र देते है ऐसी नगरी है काशी. काशी के कण कण में शिव का वास है और इसे अविमुक्त क्षेत्र भी कहते है क्योंकि शिव जी कभी भी इसका त्याग नहीं करते है.

आनंदवन के नाम से सबसे पहले जाना जाता था ये नगर जिसके इतिहास और महत्त्व का वर्णन नहीं किया जा सकता है. फिर भी इसमें मौजूद सबसे प्रमुख मणिकर्णिका घाट के बारे में आप कितना जानते है? इस घाट का नामकरण कैसे हुआ ये भी नहीं जानते होंगे आप.

जाने हमसे थोड़ा इसके बारे में....


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आदि काल की बात है जब इस घाट पर भगवान् विष्णु ने शिव जी की तपस्या की थी, उस समय तक गंगा धरती पर अवतरित भी नहीं हुई थी. तब भगवान् विष्णु ने अपने पैर की ठोकर से एक गद्दा बना दिया जो की तपस्या करने वाले विष्णु जी के पसीने से भर गया था.

तब शिव प्रकट हुए और उन्हें सुदर्शन चक्र दिया था, तब वंहा आये शिव जी के कान का कुण्डल गिर गया था जिसे संस्कृति में मणि कर्णिका मतलब कान का कुण्डल कहते है इसी पर उस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा है. बाद में भगवान् विष्णु के पसीने से बने उस सरोवर में गंगा भी मिल गई.

इस संयोग से ये घात अति पवित्र बन गया हालाँकि यंहा शमशान बना दिया गया लेकिन हमारे हिसाब से ये स्थान पिंड दान आदि के लिए बेहद उत्तम और सर्वोत्तम है. हमारे अनुसार शमशान को थोड़ा पास ही अन्यंत्र किया जाना चाहिए और इस घात पर पिंडदान आदि का विधान ही होना चाहिए ताकि ये शुद्ध और स्वस्थ रहे....जय श्री राम 

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