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जिस पेड़ के निचे मार्कण्डेय जी ने की थी तपस्या, राम सीता ने विश्राम वो है इस आर्डिनेंस डिपो में....

"उत्तरप्रदेश के नव नामित प्रयागराज शहर में त्रिवेणी संगम है और इसी स्थान पर मार्कण्डेय जी ने तपस्या कर पाई थी चिरंजीवी उम्र, लेकिन अब ये वट रह गया एक आयुध फैक्ट्"
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image sources : Mygodpicture

चिरंजीवियों में से एक भृगु ऋषि के पौत्र और मरकंडू ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय के बारे में तो सभी जानते है लेकिन ये नहीं जानते होंगे की उन्होंने शादी भी की थी. उनके एक पुत्र भी था जिसका नाम वेदशिरा था क्योंकि गृहस्थ धर्म और पुत्र पैदा किये बिना पूर्वज प्रसन्न नहीं होते है.

उनकी उम्र 12 वर्ष ही नियत थी लेकिन पुरुषार्थ दिखाया और भगवान् शिव को प्रसन्न कर उन्होंने चिरंजीवी उम्र पाई और आज भी वो अदृश्यरूप में तपस्या कर रहे है. क्या आप जानते है की उनका जन्म स्थान हाटकेश्वर यानि की पुष्कर में ही है और उन्होंने ही ब्रह्मा जी के मंदिर की स्थापना की थी?

लेकिन ये सब उन्होंने लौटकर किया था उसके बिच वो अपना घर छोड़ तपस्या कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए प्रयाग में आ गए थे. वंहा उन्होंने एक वटवृक्ष के निचे बैठकर तपस्या की थी और वंही पर शिव जी को प्रसन्न कर पाई थी चिरायु, क्या आप जानते है वो वटवृक्ष अब अक्षयवट के नाम से प्रसिद्द है लेकिन वो कहा है?

उसकी रक्षा करते है स्वयं शिव....


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प्रयागराज में संगम तट पर ही वो अक्षयवट आज भी स्तिथ है लेकिन वो आम लोगो के लिए दुर्लभ है क्योंकि वो आर्डिनेंस फैक्ट्री के अंदर है जो की अकबर के बनाये किले में है. कुम्भ मेले के समय सिर्फ एक दिन के लिए उसके दर्शन की अनुमति होती है इसलिए वो होकर भी नहीं है सुलभ.

असल में उसकी मान्यता इतनी थी की लोग उसपे से कूद कर आत्महत्या करते थे मोक्ष के लिए, बाद में अकबर ने उसे अपने किले में ले लिया. चीन और कई और घुमक्क्ड जब भारत आये थे (मुग़लकाल से पहले) तो उस वृक्ष के बारे में उन्होंने लिखा है अपने संस्मरणों में.

उस वृक्ष के निचे कंकालों के ढेर लगे रहते थे कभी अब वो बंद है,लेकिन इसमें गलती लोगो की भी है क्योंकि उन्होंने किसी पर विश्वास किया शाश्त्र नहीं पढ़े....


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असल में जैसे काशी प्राण छोड़ने से मोक्ष मिलता है वैसे ही प्रयाग में भी मरने से ये ही फल मिलता है लोग इस बात को न समझ आत्महत्या करने लगे लेकिन आत्महत्या और मरने में फर्क है और उनकी दुर्गति ही हुई होगी. इस अक्षयवट को बाबर ने भी जलाने की कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो पाया.

किले के खुले हुए भाग में एक पातालपुरी नाम का मंदिर बना है जिसके लिए दावा किया जाता है की इस मंदिर में उस पेड़ की टहनी रखी है या उसी अक्षयवट की जड़ो से ही इसका निर्माण हुआ है. हो सकता है किसी ने अपनी दुकानदारी के लिए इसका निर्माण कर दिया हो और प्रशासन ने श्रद्धालुओं के भीड़ से बचने के लिए इस अफवाह को बढ़ा दिया हो.

कभी जाए प्रयागराज तो जरूर जाए लेकिन यंहा, इस वृक्ष के उतर में ब्रह्मा जी अदृश्य रूप में रक्षा करते है, विष्णु जी वेणीमाधव (मंदिर) के रूप में और शिव तो इसी अक्षयवट के निकट विराजते है उसकी रक्षा के लिए.
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