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आपने सुन्दरकाण्ड के ये दोहे अगर नहीं समझे तो आपका जीवन व्यर्थ है, जरूर पढ़े

"वैसे तो मनुष्य जन्म लेकर रामायण ही पढ़ना और समझना दुर्लभ है लेकिन फिर भी लोग सुन्दरकाण्ड के ही दीवाने क्यों है, अगर अपने उसका हिन्दू अनुवाद नहीं पढ़ा तो व्यर्थ जी"
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हनुमान ही सबसे बड़े पंडित और परकाण्ड पंडित है जिन्होंने जुगल जोड़ी सीताराम का शोक हर लिया अपने वाक्यों के पराक्रम से....

सीता को सुधि लेकर लौटे हनुमान जी से जब राम जी ने पूछा की सीता क्या जीवित है....तब हनुमान जी ने सुन्दर उतर दिया 
नाम पाहरू दिवस-निशि, ध्यान तुम्हार कपाट! 
(उनके प्राणो पर राम नाम का पहरा है और आपके ध्यान का दरवाजा लगा है)
लोचन निज पद जंत्रित, जाय प्राण केहि बात!!  
(उनकी आँखों में आपके चरणों का ताला लगा है, तो प्राण कैसे जा सकते है!!

राम जी ने पूछा के सीता जी कैसी है किस हाल में है....तब हनुमान जी ने कहा...
सीता के अति विपत्ति विशाला बिनहि कहे भली दिन दयाला! 
सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है लेकिन न कहने में ही भलाई है क्योंकि अगर में कहूंगा तो आपको और ज्यादा कष्ट होगा! 

तब राम जी ने कहा की तन मन से सीता मेरे प्रति समर्पित है फिर भी वो संकट में है ये मेरे लिए डूब मरने की बात है...
तब हनुमान जी ने कहा : "कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोइ जब तब सुमिरन भजन न होइ....."
अर्थात : हे राम जी विपत्ति का क्षण वो ही है जब आपका ध्यान, जप और भजन न हो और सीता जी तो आपके ध्यान से एक पल भी नहीं हटती तो विपत्ति कैसी......राक्षसों की औकात ही क्या आपके सामने आप जल्द ही सीता जी को ले आएंगे....

तब श्रीराम जी ने हनुमान जी की प्रसंसा करते हुए कहा.....
हे हनुमान, तुम्हारे समान मेरा उपकारी इस सृस्टि में कोई नहीं है न को सुर न कोई नर और न ही कोई प्राणी
तुम्हारे इस एहसान का में बदला कैसे चुकाओ ये सोच कर ही मेरा मन तुम्हारा सामना नहीं कर पाता है 
तुम्हे हमपे जो ऋण चढ़ा दिए है उससे में कभी मुक्त नहीं हो पाउँगा ये मेने विचार कर के देख लिया है..

इस्पे भी हनुमान जी को गर्व नहीं हुआ बल्कि वो रोते हुए राम जी के चरणों में गिर गए....
बार बार राम जी उन्हें उठाने की कोशिश करते लेकिन हनुमान जी ने उनके चरण नहीं छोड़े...

इस झांकी को याद करते हुए भगवान् शिव की आँखों से आंसू छलक गए और गला रुध गया!
ऐसे हनुमान जी ने राम जी का भी शोक हर लिया था, तुलसीदास जी को सादर प्रणाम....

जाने सीता जी को कैसे समझाया परकाण्ड पंडित हनुमान जी ने.....


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रावण एक महीने का समय देकर गया तो जानकी जी धैर्य खो चुकी थी, उस दिन हनुमान नहीं पहुँचते तो शायद वो अगले दिन तक आत्मदाह करके मर जाती. हनुमान जी पेड़ पर बैठे थे उन्होंने सोचा की अगर में सीधे उनके सामने जाऊंगा तो सीता जी मुझे रावण का ही छल समझेगी और मेरा आना व्यर्थ हो जायेगा.

तब हनुमान जी ने रामकथा (जन्म से) सुनाने की सोची लेकिन अगर वो संस्कृत में कहते तो भी सीता जी को शक हो जाता इसलिए उन्होंने अयोध्या के पास प्रचलित अवधि भाषा में राम कथा आरम्भ की जिसे सुन सीता जी प्रसन्न हुई. तब सीता जी ने कहा की मेरे कानो में जो अमृत घोल रहा है वो कौन है मेरे सामने क्यों नहीं आता भाई तब हनुमान जी ने ऊपर से अंगूठी गिराई.

सीता जी अंगूठी पहचान गई लेकिन हनुमान जी से भी पहले वो मुंह फेर कर बैठ गई लेकिन तब हनुमान जी ने राम जी की कही पति पत्नी की गुप्त बातें कही तो उन्हें उनपे विश्वास हुआ और हनुमान जी को तब उन्होंने अपना धर्म पुत्र मान लिया.

डूबते को तिनके का सहारा ये मुहावरा सीता जी ने बनाया था उन्होंने हनुमान जी से कहा की मझधार में डूबती हुई मुझको तुम नाव हुए " बूड़त बिरह जलधि हनुमाना, भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥" जय सियाराम जय जय सियाराम 
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