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वैकुण्ठ से भी पहले भगवान् कृष्ण का गोलोक था मौजूद, जो की असल में शिव जी की गौशाला है

"हरी अनंत हरी कथा अनंता जब कम से कम 17 लाख साल पहले घटित रामायण पर दुनिया को संदेह है तो वो हमारा इतिहास क्यों मानेगी और इसे कल्पित कथा ही कहेगी, गोलोक के बारे"
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अगर आप सनातन में मानने वाले है तो शायद ये बात आप शाश्त्रो में पढ़कर जानते ही होंगे लेकिन अगर नहीं पढ़े है तो भी अगर आप आस्था में कट्टर नहीं है तो आपको इस बात से कोई आपत्ति नहीं होगी. वास्तव में भगवान् तो निर्गुण ही है जिसका कोई आकर कोई प्रकार नहीं है लेकिन लोककल्याण केलिए वो अलग अगल रूप एक ही रूप से धरती है.

भगवान् विष्णु के उपासक (वैष्णव) अगर शिव से उन्हें बड़े समझे तो ये बात गलत है और ऐसे ही शिव के उपासक(शैव) अगर विष्णु से उन्हें श्रेष्ठ समझे तो ये भी गलत है. असल में दोनों एक रूप और गुण वाले है बस लीला के लिए अलग अलग रूप लिए हुए है.

वैसे तो शिव पुराण में शिव को परम् सत्ता तो विष्णु पुराण में विष्णु को परमसत्ता कहा है लेकिन अगर आप दोनों पढ़ेंगे तो दोनों एक दूसरे को अपना पूरक (इष्ट) ही कहेंगे. शाश्त्रो में लिखे अनुसार तो भगवान् कृष्ण भगवान् विष्णु के भी पहले के है और वैकुण्ठ से पहले गोलोक था.

जाने आखिर क्या कहा है इस बारे में कृष्ण पर आधारित ब्रह्मा वैवर्त पुराण में....


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असल में जो भी शाश्त्र हमारे पास आज मौजूद है वो सब संक्षिप्त में है क्योंकि उनको पूर्ण रूप से पढ़ेंगे तो उम्र निकल जाएगी. इसलिए उनकी बात सभी को जो की कम आस्तिक है समझ नहीं आती है, श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी के क्रोध से एक बालक जन्म जिसका आधा शरीर पुरुष का तो आधा औरत का था जो की रूद्र थे यानि की महादेव.

वंही शिव पुराण के अनुसार भगवान् शिव ही अनंत थे जो साकार हुए अर्धनारीश्वर रूप में जिन्होंने अपने दांये हाथ पर अमृत रगड़ा जिससे की भगवान् विष्णु प्रकट हुए और उनकी नाभि कमल से तब ब्रह्मा जी. उन्ही ब्रह्मा जी ने तब सृस्टि की रचना की और उस रचना में रूद्र ने उनका साथ दिया बाद में वो संहारक, ब्रह्मा रचनाकार तो विष्णु पालक बने.

इसलिए ज्यादा संशय में न पढ़े और ये ही जाने की भगवान् अनंत ही सबकुछ है वो ही विष्णु और शिव है....पर जाने ब्रह्मा वैवर्त का कृष्ण और विष्णु जी के बारे में वृतांत....


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भगवान् शंकर कैलाश से पहले गोलोक में ही रहते थे जो की उनकी गौशाला थी, वंही पहली बार विष्णु जी का प्राकट्य हुआ लेकिन वैवर्त पुराण के अनुसार तब कृष्ण का प्राकट्य हुआ था. तब कृष्ण ने अपने शरीर के रोमो से राधा को बनाया और अपने दांये आगे से विष्णु हुए और बांया अंग कृष्ण रूप में ही रहा.

तब राधा के आधे अंग से ही लक्ष्मी प्रकति और तब विष्णु और लक्ष्मी दोनों वैकुण्ठ लोग प्रस्थान किये जबकि राधा कृष्ण गोलोक में ही रहे वंहा के अधिपति बन के. मतलब गौलोक जो शिव की गौशाला था वो सबसे पहले था शिव कैलाश पर रहे और ब्रह्मा जी के कोप से प्रकट हुए 11 रूद्र स्वर्ग में इंद्र के सेना में शामिल हो गए.

इस सिद्धांत से समझ आता है की भगवान एक अनंत है जो निर्गुण है उसे से सब विभक्त हुए है लेकिन निर्गुण की भक्ति पूजा असंभव है इसलिए वो शालिग्राम या शिवलिंग या अवतार रूप में प्रकट हुए है जिनकी हम पूजा उपासना भाव से कर सकते है अन्यथा हम नास्तिक हो जायेंगे.
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