जिन्ना मुस्लिमो का, अकालीदल सिक्खो का तो कांग्रेस हिन्दुओ की प्रतिनिधि थी अंग्रेजो की नजर में...

"भारतीय इतिहास के बारे में आप ज्यादा जानने की कोशिश करते नहीं और सरकार उसे इसलिए छुपाती आई क्योंकि इससे उनकी पार्टी को नुक्सान हो सकता है, हालही में थैंक्यू नहरू"

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आज के समय में धर्म में राजनीती आ रही है और राजनीती में धर्म आ रहा है ऐसे में आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है, कांग्रेस पार्टी पर जो की देश की सबसे पुरानी पार्टी है मुस्लिमो की पार्टी होने के आरोप लग रहे है वो स्वीकार भी कर रहे है वंही बीजेपी पर हिन्दुओ की राजनीती करने का आरोप लग रहा है.

ऐसे ही असरुद्दीन ओवैसी अभी मुसलमानो की राजनीती कर रहे है तो मायावती/पासवान/अठावले दलितों की (अब सेक्युलर होने की कोशिश में) करती आई है. वंही कुछ पार्टिय ऐसे है जो एक बहुल जाती और एक धर्म की राजनीती करती है जैसे JDU और SP तो वंही लेफ्ट गैर हिन्दू धर्मो की राजनीती करते है.

लेकिन क्या आपको पता है ये सिलसिला जारी कंहा से हुआ था? असल में हमारा देश शुरुवात से ही पंथ निरपेक्ष था मुग़ल आक्रांता आये धर्म परिवर्तन किया लेकिन राजाओ को छोड़ आम जनता ने कभी विद्रोह नहीं किया था क्योंकि वो सहनशील और अहिंसक थी, है और रहेगी.

आजादी के पहले कांग्रेस हिन्दुओ की प्रतिनिधि थी जो अब मुस्लिम पार्टी बन गई!


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1885 में अंग्रेज नौकर शाह हुमे के कहने पर भारतीयों ने कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी उनका मानना था की अंग्रेजो से लड़ने के लिए भारतीयों को एक पार्टी बनानी चाहिए जो की अंग्रेजो के सामने भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर सके. 1932 में जाकर जब अर्ध स्वतंत्रता देने की बात आई जैसे तब की मद्रास प्रेसिडेंसी में चल रही थी तो जाकर ये प्रतिनिधित्व मिला.

इसमें अंग्रेजो ने बांटो और राज करो के तहत अकाली दल को सिक्खो का, जिन्ना को मुसलमानो का तो कांग्रेस को हिन्दुओ का प्रतिनिधि माना था. इसमें भी दलितों के लिए अलग प्रतिनिधित्व मिल रहा था लेकिन गाँधी जी के अनशन के चलते 20 % आरक्षण पर आंबेडकर ने हिन्दुओ में ही सम्मिलित रहने का प्रस्ताव मान लिया तब पुरे हिन्दुओ का कांग्रेस को प्रतिनिधित्व मिला था.

जबकि शुरुवात से ही हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा समर्थन करने वाली हिन्दू महासभा को कुछ भी हासिल नहीं हुआ था...


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यंहा गौर करने की बात ये है की खिलाफत आंदोलन से पहले जिन्ना की सुनने वाले मुस्लमान बेहद कम संख्या में थे मतलब उनकी मुसलमानो में चलती नहीं थी और देश का मुस्लमान गाँधी जी को मानता था. लेकिन मक्का और मदीना का संरक्षण किसे मिले इस्पे टर्की में अंग्रेजो ने खलीफा को हटा दिया था तब गाँधी जी को गलत फेहमी हो गई.

उन्हें ये लगा की इस आंदोलन के जरिये हम सभी मुसलमानो को कांग्रेस के साथ जोड़ सकते है लेकिन जुड़ तो गए लेकिन फिर वो जिन्ना के होकर रह गए और मुस्लिम समर्थन पर स्तिथि उलट हो गई.

अलग खालिस्तान के मुद्दे पर सिक्ख एक थे लेकिन आजादी देने के समय अंग्रेजो ने सिक्खो को अलग राष्ट्र का प्रस्ताव रद्द कर दिया और सिर्फ जिन्ना के लिए अलग पाकिस्तान पर ही कायम रहे. 

2014 में वो ही कांग्रेस पार्टी अधिकतर हिन्दुओ का प्रतिनिधित्व खो गई और कभी जो 415 सीट जीती थी वो 44 सीट पर आ गई.

story sources : wikipedia (indian partition)

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