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1793 में बंगाल में हुए सन्यासी आंदोलन के बाद सुनसान पड़े काली मंदिर में मदर टेरेसा ने बना दिया

"18 साल की उम्र में नन बन गई और उसके बाद अपनी माँ बहिन को नहीं देखा था टेरेसा ने, ये उनका असली नाम नहीं है बल्कि उनका असली नाम भी कुछ और है! बचपन से ही वो बंगाल"
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image sources : bbc

एंजेजे गोंक्सहे बॉजक्सहीउ जी है ये ही असली नाम था मदर टेरेसा का जो की अमेरिका के रिपब्लिक ऑफ़ मेसेडोनिया की राजधानी अल्बानिया में पैदा हुई थी. उनका जन्म वैसे तो 26 अगस्त 1910 को हुआ था लेकिन उसके अगले ही दिन उनका खतना कर दिया गया जिसे वो अपना असली जन्म दिन मानने लगी. 

असल में बचपन से ही वो धार्मिक प्रवर्ति की थी और बहुत कम उम्र में ही भारत के बंगाल में ईसाई संस्थाओ के काम के बारे में सुनती थी और प्रभावित होती थी. 18 साल की उम्र में ही वो सिस्टर बन गई और इंग्लिश सिखने लगी क्योंकि भारत में इसी भाषा में संवाद होता था मिशनरियों में.

इस दिन के बाद उन्होंने अपने परिवार से कभी भी मुलाक़ात नहीं की थी, 1929 में वो भारत आई और एक कान्वेंट स्कूलमे पढ़ाने लगी और दो दशकों के बाद वो वंही प्रधानाध्यापक बन गई. यंहा उन्होंने बंगाली भी सीखी और उसी स्कूल के नाम पर उन्होंने अपना नाम थेरेसा रख लिया.

जाने उनके बारे में कुछ और चमत्कारिक फैक्ट्स....


image sources : youtube

भारत के आजाद होने के बाद उन्होंने भारत की नागरिकता लेली और कई महीनो बिहार में रही जंहा उन्होंने नर्स का काम सीखा. तभी से उन्होंने सूती नीली पट्टी की साडी पहनना शुरू किया जो बाद में उनका ही ब्रांड बन गया, 1950 में उन्होंने वेटिकन से मिशनरी खोलने की परमिशन मिल गई.

1952 में कोलकाता में बंद बड़े एक मंदिर (कालीघाट) जो की शायद 1793 में सन्यासी आंदोलन से जुड़ा था और प्रतिबंधित कर दिए जाने (अंग्रेजो के द्वारा) बंद पड़ा था को ही अपना डेरा बना लिया और उसे नाम दिया कालीघाट हाउस फॉर दी डाईंग. वंहा पर हर धर्म के लोगो को जो की लावारिस और मरणासन थे रहने की इजाजत मिली जो अब ऐसा दीखता है (ऊपर).


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भारत में कई हिंदूवादी संगठनो ने उनकी आलोचना की क्योंकि उनके ही चलते लोग धर्म परिवर्तन करने लगे थे, खुद भारत के वर्तमान गृहमंत्री ने कहा की "क्या हम बिना धर्म परिवर्तन के उद्देश्य के सेवा नहीं कर सकते है?" लेकिन इसके आलावा और भी कई कारण थे उनकी आलोचना के...

मरणासन व्यक्तियों को वो दर्द से तड़पने देती थी उनका मानना था की इससे उनके पाप धुपेंगे और आत्मा शुद्ध होगी, बचे हुए पैसे किसी गरीब के काम आएंगे. 

उनकी सेवा के लिए उन्हें भारत सरकार ने भी कई पुरस्कार दिए तो वेटिकन से उन्हें संत का दर्जा मिला उन्होंने कई चमत्कार भी दिखाए थे. उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार भी मिला था अब वो भारतीय के बिच नहीं है लेकिन उनकी संस्थ्यए (जैसे निर्मल ह्रदय) भारत में काम कर रही है...

story sources: wikipedia
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