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असम की कामाख्या देवी से भी ज्यादा प्रभाव वाला ये शक्ति पीठ रह गया पाकिस्तान में....

"श्राद्धीय नवरात्र में पूरी दुनिया के अघोरी सिद्धिया प्राप्त करने के लिए असम के कामाख्या मंदिर में जुटते है इस मौके पर शक्ति की साधना जल्द पूर्ण होती है और सिद्ध"
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image sources : Trell

असम का कामाख्या मंदिर जो गोवाहाटी स्टेशन से 10 किमी दूर नीलांचल पर्वत पर बना हुआ है, पौराणिक मान्यता है की शिव के अपमान के कारन सती ने अपने पिता के यज्ञ कुण्ड में कूद गई थी. तब उनके शरीर के टुकड़े पृथ्वी पे जगह जगह गिर गए थे जिसमे से यो-नि भाग नीलांचल पर्वत पर गिरा था जन्हा ये मंदिर बना है.   

मंदिर में हर साल "अम्बुबाची" नमक  मेला लगता है, जीसमें भारतभर के तंत्र साधक आते हैं, मेले के दौरान माता कामाख्या को मासिकी आती हैं और तीन दिन में योनि-कुंड से रक्त प्रवाह (आम दिनों में जल प्रवाह होता है ) होता है इस कारण भी  मेले को काम रूपों का घड़ा कहा जाता है।

दशकों की मन्त्र साधना के बाद जो सिद्धिया प्राप्त होती है वो इस दौरान सिर्फ एक ही दिन में हो जाती है ऐसी महिमा है इस शक्ति पीठ की. लेकिन कम ही लोग जानते होंगे की इस पीठ से भी ज्यादा प्रभाव वाला एक और शक्तिपीठ है जो बंटवारे में पाकिस्तान में ही रह गया था.

जाने उस शक्ति पीठ के बारे में कुछ ख़ास....


image sources : youtube

पाकिस्तान के बलोचिस्तान जिले के मकरान शहर में है 52 शक्ति पीठो में से सबसे ज्यादा प्रभाववाला पीठ माता हिंगलाज भवानी का मंदिर. हिंगोल नदी के किनारे बना ये शक्तिपीठ पिछले तीन दशकों में पाकिस्तान में बचे हुए हिन्दुओ के लिए आस्था का बड़ा तीर्थ बन गया है.

हिंगोल नेशनल पार्क के दायरे में बनी एक गुफा में बना है ये मंदिर पूरी तरह से प्राकर्तिक है और इसके आसपास करीब 10 और भी सनातन आस्थाओ के तीर्थ है. 


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चैत्र महीने में यंहा मुख्य मेला लगता है जिसमे कुछ भारत से तो बाकि पाकिस्तान से तीर्थकर आते है, आजादी के पहले पाकिस्तान में 14% हिन्दू और सिख थे जो की अब 1.4% रह गए है. पिछले साल यंहा तीर्थ आने वालो की संख्या करीब 25-30 हजार की थी.

पहले यंहा आने के लिए 150 किलोमीटर पैदल रेगिस्तान की यात्रा करनी पड़ती थी लेकिन अब कराची से रोड बन गई है (ग्वादर को जोड़ने वाली) तो 328 किमी का सफर चार घंटे में ही हो जाता है. यंहा दर्शन करने वाले में वैसे तो व्यापारी और सरकारी कर्मचारी ही होते है लेकिन अधिकतर गरीब लोग ही आते है.

वो गरीब लोग वो है जो नीची जातियों से है और मजदूरी या बंधुआ मजदूरी से अपना घर चलाते है....अब जाने हिंगलाज भवानी का आध्यात्मिक महत्त्व....


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भगवान् विष्णु ने जब शिव जी के असमय प्रलय कर देने के डर से सती की देह के 52 टुकड़े कर दिए तो सती का सर हिंगलाज में गिरा था इसलिए इस पीठ का विशेष महत्त्व है. स्कन्द पुराण के अनुसार कोई भी इंसान चैत्र शुक्ल अष्ठमी के दिन यंहा भक्तिभाव से जागरण कर देता है तो उसका मोक्ष तय हो जाता है.

सोचिये संसार को सञ्चालन करने वाले त्रिदेवो को जो शक्ति देती है उस शक्ति का सर जंहा गिरा था वंहा कैसा शक्तिपुंज होगा, विभाजन का सबसे बड़ा दुःख कोई है तो ये ही शक्ति पीठ है....
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