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कुश-लव को कंठस्थ करवा दी थी वाल्मीकि जी ने रामकथा, उन्हें नहीं मालूम था है वो उन्ही की कहानी...

"रामायण की कहानी ऐसी आनंदमय थी के उसे सुनकर ऋषि मुनि भी रोने लगते थे और उपहार में कुशलव को भेंट देते थे लेकिन वो बालक खुद नहीं जानते थे की ये उन्ही की कथा है...."
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image sources : swaminarayan

श्री राम के दोनों पुत्रो में से बड़ा कौन था ये भी आधे भारतीय नहीं बता पाएंगे, दोनों में से कुश बड़े थे और छोटे थे लव जिन्होंने लाहौर नगर बसाया था. उनके अयोध्या के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को पकड़ने और बाद में युद्ध की कहानिया तो आपने टीवी पर देखि होगी लेकिन उसके पहले और बाद में क्या हुआ था?

गर्भवती सीता जी राम जी के दिए वरदान का उपयोग करते हुए गंगा किनारे वन में अकेली रहने आ गई थी (गर्भवती सीता को देख कर राम जी ने एक वरदान मांगने बोला था सीता जी को) और ऐसे उन्होंने अपने कुल के मान की रक्षा की क्योंकि भले ही एक धोबी ने झूठा ही आरोप लगाया हो लेकिन राजधर्म के अनुसार वो भी राजा को कलंकित करता है.

तब लक्ष्मण भी रो दिए थे लेकिन उनके सारथि (जो की दशरथ जी के भी सारथि थे) ने कहा की ये तो पहले से होना तय था दुर्वासा जी ने जन्म के बाद ही बता दिया था दशरथ जी को ये होगा तो लक्षमण का शोक कम हुआ था. वाल्मीकि जी ने तो घटित होने से पहले ही रामायण लिख दी थी और इसलिए वो सीता जी को आश्रय देने आये और उन्होंने उन्हें अपनी धर्म पुत्री बना लिया.

अगर वो ऐसा नहीं करते तो सीता जी उनसे बात तक नहीं करती...जाने कुशलव के ऐसे ही चौंकाने वाले सत्य...


image sources : blogspot

धर्म पुत्री बनाये जाने के बाद भी सीता जी अपना सारा काम स्वयं करती थी, नियत समय पर दोनों पुत्रो का जन्म हुआ तो वाल्मीकि ने ही उन बच्चो का नामकरण संस्कार किया. पैदा होते ही हाथ में कुश लिए इसलिए बड़े को कुश और दोनों के जन्म में एक लव (समय का पैमाना) का अंतर था इसलिए छोटा लव.

ब्रह्मा जी के कहने पर वाल्मीकि जी ने घटित होने से पहले ही दिव्यदृष्टि से देखकर रामायण लिख दी थी लेकिन उहे कोई ऐसा योग्य शिष्य नहीं मिला जिससे वो उस महाकाव्य का प्रचार करवा सके. कुशलव में वो गुण थे तो उन्होंने दोनों को कंठस्थ करवा दी थी रामायण.

लेकिन दोनों को ही ये नहीं पता था की ये कथा असल में उनके ही माता पिता और परिवार की है, दोनों घूम घूम कर ऋषियों को ये कथा गाकर सुनाते थे और रोते हुए (कथा सुन कर) ऋषि उन्हें खूब उपहार और वरदान देते थे....


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वाल्मीकि जी ने उन्हें क्षत्रिय धर्म जरूर पढ़ाया था और उन्हें ये बताया था की वो दोनों क्षत्रिय है, इसी के चलते उन्होंने यज्ञ अश्व पर जब चुनौती लिखी देखि तो घोड़ा पकड़ लिया. युद्ध की कथा तो सभी को पता है और युद्ध के बाद ही दोनों बालको को पता चला की श्री राम ही असल में उनके पिता है.

अगर वो चाहते तो पूरी अयोध्या को भष्म कर सकते थे लेकिन वाल्मीकि जी के कहे अनुसार उन्होंने पूरी अयोध्या में सीता जी की कथा का प्रचार किया और सबको मजबूर कर दिया की वो राम जी से विद्रोह करे और सीता जी को पुनः लौटा लाये. हुआ भी ऐसा और वाल्मीकि जी की शपथ के बाद सीता जी पुनः रामदरबार में लौट आई.

यंहा ये भी जान ले की वाल्मीकि रामायण में जो सीता का धरती में समाना बताया गया था पर असल में ऐसा हुआ नहीं था, पद्मपुराण जो की वेदव्यास जी ने लिखी करीब 5200 साल पहले उसमे लिखा है की सीता जी लौट आई थी धरती में नहीं समाई थी और सभी यज्ञो में वो रामजी के बगल में बैठी थी अंत में उनके साथ ही जलमग्न समाधि ली थी.

ऐसा ही हुआ रहेगा क्योंकि पतिव्रत ली गई औरत अपने पति के कर्म पे तनिक भी क्रोधित नहीं हो सकती है और न ही उनकी आज्ञा के बिना धरती में समा सकती है. ऐसे रामायण की भी हुई थी हैप्पी एंडिंग....जय श्री राम 
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