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गोपियों ने की थी श्राद्धीय नवरात्रो में देवी की पूजा, कृष्ण ने सुधारि वस्त्रहरण से उनकी भूल और....

"शिव जी ने राम जी से कहा की लंका में कात्यायिनी देवी सदा विराजमान है, रावण हर श्राद्धीय नवरात्र में उनकी उपासना करता है! अगर रावण ने वो पूजा शुरू कर दी तो वो...."
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भारत त्योहारों का देश है और नित कोई न कोई छोड़ा बड़ा त्यौहार आता ही रहता है, हालाँकि सभी धार्मिक है लेकिन फिर भी पुरे जोश से मनाते है भारतीय इन त्योहारों को. श्राद्धीय नवरात्र भी ऐसा ही त्यौहार है लेकिन ये त्यौहार हम आप ही नहीं बल्कि धरती पर हुए अवतार भी मनाते थे.

श्राद्धीय नवरात्र का आयोजन तो रावण ही नहीं बल्कि श्रीराम ने भी किया था, लेकिन रामायण के 17 लाख साल बाद भी गोपिया भी ये त्यौहार मनाती थी. जी हाँ गोपिया भी श्राद्धीय नवरात्र में शक्ति की उपासना कर थी और उन्हें इसका फल मिला था कृष्ण की प्रेमिकाए बन कर.

हालाँकि श्री कृष्ण तब मात्र 8 वर्ष के ही थे लेकिन गोपियों की पूर्व जन्म की तपस्या के फल के लिए ही उन्होंने रासलीला की थी लेकिन इसके पीछे की कहानी बड़ी विचित्र है. गोपिया रोज सुबह उठकर यमुना में स्नान करती थी और मिट्टी की कात्यायनी की पूजा करके उनसे  श्रीकृष्ण का सत्संग मांगती थी.

लेकिन उनकी पूजा में त्रुटि थी असल में वो यमुना में नग्न अवस्था में स्नान करती थी तो कृष्ण ने ही सुधारि थी उनकी पूजा...


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बाल श्री कृष्ण द्वारा गोपियों को का जो वस्त्रहरण प्रकरण था वो उनकी भलाई के लिए ही था, गोपिया जब शर्मिंदा हुई और उन्होंने कृष्ण द्वारा समझाने पर उनके प्रति समर्पण कर दिया तो कृष्ण ने उन्हें वस्त्र भी लौटा दिए और उनसे भूल सुधार करवाई.

श्री कृष्ण ने उन्हें बताया की पानी नई नग्न नहाने से वरुणदेव नाराज हो रहे है और इसलिए उन्हें अपनी पूजा का फल नहीं मिल रहा था. तब गोपियों ने उसी अवस्था में वरुण देव से क्षमा मांगी और कृष्ण के ही हाथ जोड़ लिए जो की एक तरह से उनका कृष्ण के प्रति समर्पण था.


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तब नवमी के दिन श्री कृष्ण ने ही कात्यायनी रूप में सभी गोपियों को दर्शन दिया और वरदान मांगने के लिए बोला, तब गोपियों ने श्री कृष्णा का संग माँगा था. श्री कृष्ण रूप शक्ति ने तब उन्हें आश्वासन दिए की उनकी मुराद येन केन प्रकारेण ही सही लेकिन पूरी होगी.

तब श्री कृष्ण ने असली रूप में आकर गोपियों को शरद पूर्णिमा के दिन से रसलीन आरम्भ करने का वादा किया था....


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नवरात्र के दौरान जो गरबा होता है वो रासलीला का ही प्रतीक है अन्यथा जोड़ो के नाचने का क्या तात्पर्य होता है. इसलिए गरबे में जाए तो नेक नियत से हवस की दृष्टि लेकर नहीं....

तब शरण पूर्णिमा के दिन कृष्ण आये और उन्होंने बाल रूप में ही सभी गोपियों को अपना यौवन रूप दिखाया उन सब के साथ विहार किया. विहार से मतलब है की गोपियों संग समय बिताया उस समय समय ठहर गया था और एक कल्प (धरती के साढ़े आठ अर्ब वर्ष) तक वो लीला चली.

ये गोपिया वृन्दावन की सभी गाय बच्छड़े मनुष्य सभी पूर्व जन्म के साधू थे जिनको ज्ञात हो गया था की कृष्ण जन्म होने वाला है इसलिए इन सभी ने करोडो अरबो वर्षो तक तप कर के वरदान में ये दिन पाए थे.....


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उस दिन के बाद से ही ब्रिज में रोज रात्रि में रासलीला होती थी जिसमे दियो से रौशनी की जाती थी एक बार में नौ मन तेल लगता था इसी पर एक कहावत बनी है की "ना नौ मन तेल आएगा और न राधा नाचेगी..."

भारतीय अध्यात्मीक इतिहास की कड़ी किसी न किसी इतिहास से जुडी हुई है और हमें गर्व करना चाहिए जो हम आज भी इस इतिहास को परम्पराओ में संजोये हुए है....
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