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49 मरुद्गण : अपने ही भाई को मारने के लिए इंद्र ने किया था अपनी माँ के गर्भ में वज्रपात

"देवराज इंद्र कैसे कैसे काण्ड करते है ये आप हम सभी को पता है लेकिन वो सभी कार्य वो अपने इंद्र पद को लम्बी अवधि तक बनाये रखने के लिए करते है लेकिन एक बार उन्होंने"
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image sources : 4Harmony

वैसे तो किसी के भी पाप कर्मो की जब हम चर्चा करते है तो उसके प्रचार के चलते हम भी उसके पाप के भागीदार बनते है लेकिन चूँकि ये मामला हमारे इतिहास से जुड़ा हुआ है और सिर्फ जानकारी साझा करना ही ध्येय है इसलिए हम स्वर्ग के अधिपति इंद्र के द्वारा किये अनैतिक कामो को बता रहे है जो उन्होंने अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए किये थे.

पृथु के यज्ञ का घोडा चुराना हो या सगर के यज्ञ का घोडा चुराना हो या फिर विश्वामित्र द्वारा कराये जा रहे यज्ञ में बलि पशु को चुराना हो वो सभी कुछ अपने पद के लिए कर चुके है. गौतम ऋषि के तप से डर कर ही उन्होंने अहल्या के साथ दुष्कर्म किया था ताकि वो श्राप दे और इंद्र का पद सुरक्षित रहे.

लेकिन इंद्र ने ऐसा भी निन्दित कर्म किया था जो की बहुत ही अनैतिक है, उन्होंने अपने ही भाई को माँ के गर्भ में मारने की कोशिश की थी. हालाँकि बाद में उन्हें दया आ गई और वो चाह कर भी मार नहीं पाए थे लेकिन पश्चाताप के बाद सबकुछ ठीक हो गया था.

जाने इंद्र का वो दुर्दांत कर्म....


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बात है इस कल्प के आदि की या सृष्टि के आदि की जब कश्यप से अदिति को इंद्र समेत आदित्य जन्मे थे और दिति से दैत्य हिरंगयाकश्यप और हिरण्याक्ष जन्मे थे जिन्हे भगवान् विष्णु ने मार गिराया था. तब अपने ही सौतेले बेटे इंद्र पर क्रोधित दिति ने अपने पति से ऐसा पुत्र माँगा जो इंद्र का वध कर सके.

तब कश्यप ने उन्हें एक ऐसा कठिन व्रत बताया जिसके करने पर उन्हें ऐसे पुत्र की प्राप्ति हो जाती जो इंद्र को मारकर इंद्र बन जाता. हालाँकि उसमे एक शर्त भी थी की अगर वो पुत्र इंद्र से दोस्ताना रहे तो उसके ही अनुचर होकर रह जायेंगे जिसे दिति ने स्वीकार कर लिया.


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दिति व्रत करने लगी लेकिन इंद्र को भी इसकी खबर चल गई तो वो अपनी ही सौतेली माँ की सेवा करने लगा, दिति को नहीं पता था इंद्र का इरादा. सनातन परम्पराओ में व्रत की और जीने की कुछ मर्यादा स्थापित की गई है जैसे दोपहर में न सोना खाने से पहले पाँव धोना सोने से पहले पाँव धोना पर गीले पैर न सोना आदि आदि.

एक दिन थककर दिति दोपहर में ही बिना पैर धोये सो गई इंद्र इसी मौके की तलाश में था और उसने वायुरूप में अपनी माता के शरीर में प्रवेश कर लिया. गर्भ में घुसकर उसने अपने ही भाई पर वज्र प्रहार किया जिससे वो अण्ड 7 टुकड़ो में विभक्त हो गया लेकिन मरा नहीं तब इंद्र ने फिर प्रहार किया तो वो 49 हो गए.

तब गर्भ के उन 49 अंडो ने इंद्र से प्रार्थना की के हम तो तुम्हारे भाई है हमें मत मारो हम तुम्हारे मित्रवत रहेंगे तब इंद्र को अपने से घृणा हुई और पश्चाताप से बाहर आया और माँ से माफ़ी मांगी. दिति ने माफ़ भी कर दिया और वो 49 बच्चे जब पैदा हुए तो इंद्र के अनुचर मरुद्गण बने जो की वायु के अंग गए जाते है पैदा हुए. 

"हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।" सुन्दरकाण्ड की इस चौपाई में उन 49 मरुद्गणों का ही वर्णन है....
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