"भुत लेजा, राक्षस लेजा" यु कह कर नहीं डराना चाहिए बच्चो को, जाने पुराणिक इतिहास की भयंकर कहानी...

"बच्चे शरारती होते है तो माँ फिल्मो में तो गब्बर के नाम से डराती है लेकिन असल जिंदगी में वो भुत और राक्षसों के नाम से ही डराती है लेकिन ऐसा करना शाह्स्त्र विपरीत"

image sources : pinterest

माँ और संतान का रिश्ता बेहद पवित्र होता है जिसमे किंचित मात्र भी छल नहीं है, पूत कपूत हो सकता है लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती है. इसलिए शाश्त्रो में पिता को सबसे बड़ा भगवान् तो माँ को पिता से भी बढ़कर दर्जा दिया गया है, माँ ही लोरी सुनकर सुलाती है वो ही बोलना सिखाती है और पहला गुरु भी वो ही है.

हालाँकि कलियुग में माँ की स्तिथि भी कुछ गिर गई है आज कल माँ कम सहनशील हो गई है और अपने बच्चो को जंहा 5 साल तक खुद संस्कार देने चाहिए वंही 2 से ढाई साल के बच्चो को भी परेशानी के डर से स्कूल भेज देती है. इसके साथ ही माये बच्चो को डराने धमकाने में भी पीछे नहीं है.

कुछ माँ अपने बच्चो को भले ही जानवरो से डराती है लेकिन कुछ जो की अपने बच्चो को भूत और राक्षसों के नाम से डराती है उनके लिए एक ख़ास सन्देश है. अगर आप ऐसा करती है तो आपके लिए ये भले ही मजाक हो लेकिन शाश्त्रो के अनुसार इसके हो सकते है गंभीर परिणाम.

जाने ऐसा ही भयंकर उदाहरण....


image sources : rightlog

गीता में भी और शाश्त्रो में भी सनातन इतिहास में महर्षि भृगु को ब्राह्मण श्रेष्ठ कहा गया है, उन्ही की पत्नी के साथ हुआ था ऐसा ही हादसा जिसके चलते गिर गया था उनका गर्भ और पैदा हुए थे महर्षि च्यवन (जिन्होंने बनाया च्यवनप्राश). लेकिन इस घटना में दोष भृगु ऋषि की पत्नी पुलोमा का नहीं बल्कि उनकी माता श्री का था.

पुलोमा एक राजा की बेटी थी और उनके पिता से भृगु ऋषि ने उसे दान में मांग लिया था, लेकिन जब पुलोमा छोटी थी तब उनकी माँ ने एक दिन उन्हें डराने के लिए कहा था की राक्षस लेजा इसे ये मान नहीं रही है....उसी समय एक राक्षस वंहा वायु रूप में घूम रहा था और उसने पुलोमा की माँ के इस निवेदन को सहर्ष स्वीकार किया लेकिन तब पुलोमा बच्ची थी.


image sources : vidyamishra

ऋषि च्यवन की कहानी तो आपने पढ़ ही रखी होगी लेकिन उनके जन्म की कहानी बेहद भयंकर है. उनकी माँ वो ही पुलोमा थी जिन्हे उनकी माँ ने मजाक में एक अदृश्य राक्षस को ले जाने को कहा था, पुलोमा जब गर्भवती हुई उनके पेट में च्यवन थे तब भृगु ऋषि की गैर मौजूदगी में एक राक्षस ने आश्रम में उत्पात मचा लिया.

पुलोमा को देख उसे याद आया की शायद ये वो ही लड़की है जिसे उसकी माँ ने बचपन में उसे सौंपा था तब अग्नि से उसने गवाही ली और तब पुलोमा को ले जाने लगा. तभी भृगु आ गए और उन्होंने उस राक्षस को भष्म कर दिया, पुलोमा को मारे भय के प्रसव हो गया और इसी लिए इस गर्भ के चयय के चलते पुत्र का नाम च्यवन रख दिया गया था.

दोपहर और संघ्या का समय भूतो और राक्षशो का होता है इसलिए माँ को ऐसा कभी अपने बच्चो के बारे में नहीं कहना चाहिए जैसा पुलोमा की माँ ने कहा था.

Share This Article:

facebook twitter google