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स्वर्ग से जुड़े भारतीय सनातन सिद्धांतो को समझ ले तो कभी नहीं रहेंगे भ्रम में, जाने...

"पहले आप उस सिद्धांत को जान ले! स्वर्गारोहण के बाद युधिस्ठर ही सशरीर स्वर्ग पहुंचा था, उसे वंहा अपने भाई पत्नी नहीं दिखे बल्कि उंसने देखा की दुर्योधन और दुशासन व"
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क्या वास्तव में स्वर्ग नरक जैसी कोई चीज होती है? आज कल आधुनकता के जमाने में आप ऐसे सवाल नित्य सुनते होंगे! कल किसने देखा है स्वर्ग नर्क जो है सब इन्ही है और ऐसे जो होगा देखा जायेगा कह कर लोग अपने मन की करते है और मन क्या क्या करवाता है उससे उसका तो भगवान् ही मालिक है.

असलियत ये है की इंसान के स्वाभाव पर तीन तरह के गुणों का प्रभाव रहता है जो की जन्म के समय पर ही उसपे हावी रहते है. सतगुण पहला है जो उसे दयावान दानवीर बनाता है वंही दूसरा रजोगुण जो की उसे भोग विलासी और कर्म प्रधान बनाता है वंही तमोगुण उसे अपराध करने में प्रवर्त करता है.

तमोगुणी तो अपराध ही करता है लेकिन जो रजो गुनी है वो ही उपरोक्त कही गई बातें (स्वर्ग होता है क्या?) बातें कहता है! ऐसे लोगो को स्वर्ग नहीं मिलता है और कर्मो के आधार पर इन्ही पुनर जन्म मिलता है उसमे जो दुःख है वो नर्क रूप है और जो सुख है वो स्वर्ग रूप, वंही तमोगुणी को नरक मिलता है (ऊपर मौत के बाद)!

सतगुणी व्यक्ति ही मौत के बाद स्वर्ग में सुख भोगता है....महाभारत से जाने स्वर्ग के कुछ और ऐसे ही सिद्धांत 


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महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठर स्वर्ग पहुंचा तो देखा की वंहा दुर्योधन, कर्ण दुशासन सरीखे सुख भोग रहे है जबकि पांडवो को नरक भेजा गया था (ऐसा उससे कहा गया)! इस्पे युधिष्ठर क्रुद्ध हो गए और खुद भी नरक जाने की बात कही, नरक उन्हें दिखाया गया और फिर उन्हें पुनः अपने भाइयो के पास स्वर्ग में ले जाया गया, चूँकि उन्होंने एक अर्ध सत्य बोला था इसलिए उन्हें नर्क दिखाया भर गया था. 

जब उसने पूछा की दुर्योधन कर्ण को स्वर्ग क्यों तो इंद्र ने कहा की जिसके पाप ज्यादा है उन्हें पहले पुण्य भोगने मिलते है चूँकि वो युद्ध में भले ही अधर्म से लड़े लेकिन वीर गति को प्राप्त हुए इसलिए उन्हें पहले स्वर्ग भोग मिल रहा है! बाद में उन्हें नरक की आग में तपाया जाएगा क्योंकि कर्मो का फल कभी भी नाश नहीं होता है.

मेरी नजर में तो फल की इच्छा से किये गए पुण्य से बेहतर पाप है, क्योंकि पाप का पुण्यो से नाश हो जाता है लेकिन पुण्य इंसान को भोगना ही पड़ता है और पुण्य भोगने के चक्कर में जन्म मिलेगा और जन्म में फिर कोई पाप बन गया तो दुर्गति निश्चित है. 


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एक बात और जान ले की पाप का नाश सम्भव है लेकिन किसी निर्बल की हाय कभी नष्ट नहीं होती है और वो मनुष्य को इतना दुःख देती है जिसकी कोई कल्पना नहीं है. शाश्त्रो में जो जन्म (वर्ण/जाती) के अनुसार धर्म बताया गया है उसे कष्ट पाकर ईमानदारी से निभाओ!

स्वर्ग तो अपने आप मिलेगा और मोक्ष के द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे.... उसी धर्म की रक्षा करो तो वो धर्म तुम्हारी रक्षा अवश्य करेगा, धर्मो रक्षति रक्षिताय!

अपने आप ही सब प्राप्त हो जायेगा जो हम जो कुछ भी है उसमे संतुष्ट होकर धर्म के पथ पर चले, रविदास जी को बचपन में चमड़े का काम करने में झिझक होती थी तब उनके ब्राह्मण गुरु ने ही उनसे कहा की तुम भी तो चमड़े के है इसमें शर्म कहे की अपने जन्म धर्म पर ही चलो निष्काम हो जाओ.
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