अधूरा रह गया था भगीरथ का सपना, क्रोधित जन्हु ऋषि पी गए थे गंगा को....

"गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण का पौराणिक महत्व है जो की ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को हस्त नक्षत्र में गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं इस दिन को उनके.."

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राजा सगर कंही 100 अश्वमेघ यज्ञ पुरे कर इंद्र पद हासिल न कर ले इसके लिए इंद्र ने उनका घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम (राजस्थान स्तिथ कोलायत) में छिपा दिया था. तब उसी की खोज में गए उनके 60000 पुत्रो ने जब ऋषि को जगाया तो उनकी स्वांस से ही वो अपने आप ही भस्म हो गए.

तब छोटे बेटे अंशुमान ने वो घोडा वंहा से लिवा लिया और पिता को सब कह सुनाया, सगर सशरीर स्वर्ग गए और पुत्र अंशुमान राजा बने. जी भर के राज करने के बाद वो अपने 60000 भाइयो की मुक्ति के लिए तपस्या करने गए और अपने पुत्र को राजा बना दिया ऐसे करते कई पीढ़ियों ने तपस्या की.

तब जाकर दिलीप पुत्र भगीरथ की तपस्या सफल हुई लेकिन गंगा का कोप कौन सेहन करे ऐसे में शिव की तपस्या की. शिव जी ने तब गंगा की धार सेहन करने का आश्वासन दिया लेकिन तब गंगा ने घमंड किया तो शिव ने उसे अपनी जटा में बांध लिया, भगीरथ के निवेदन में एक धार छोड़ दी जिसे लेकर भगीरथ अपने पूर्वजो की अस्थियो की तरफ चल पड़ा...


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भगीरथ आगे आगे चल रहे थे और गंगा पीछे पीछे चल रही थी जिसके ज से लोग निर्मल होते जा रहे थे. लेकिन इसी मार्ग के दौरान जन्हु ऋषि का आश्रम आता था जो की गंगा की धार में बह गया था और ऋषि कुपित हो गए थे...


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ऐसे में ऋषि ने गंगा को ही पि लिया और अपने अंदर समाहित कर लिया, ये देख भगीरथ विचलित हुए और उन्होंने क्षमा मांगी और पूरी पीढ़ियों का दुःख कह सुनाया.


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ये सुन जन्हु प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपने कान से गंगा को फिर निकाल दिया और गंगा अपने पूर्ववत मार्ग में बहती हुई सगर के 60000 पुत्रो का उद्धार कर के फिर हिमालय से 5 धाराओं में बहने लगी. जन्हु ऋषि के इस कर्म के चलते गंगा उनकी पुत्री कहलायी और इसके चलते ही उसका नाम जहान्वी भी पड़ गया.

है न गजब की पूरी कहानी...

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