दुर्वाष्टमी : पार्वती की गोद में बैठे गणेश की इस दिन पूजा करने से होंगे ये चमत्कारिक परिणाम...

"हिंदी महीनो में से भाद्रपद चौमासे में दूसरा महीना है जिसमे बड़े त्यौहार और व्रत आते है इसी में आता है दुर्वाष्टमी का त्यौहार जो की सभी समस्याओ के निवारण में राम"

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हर वर्ष भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन गणेश चतुर्थी का महोत्सव शुरू होता है जो की महारास्त्र और गुजरात में मूल रूप से (भव्य तौर पर) मनाया जाता है. इस दिन लोग एक दिन से लेकर 10 दिन तक गणपति को अपने घर में रखते है जागरण करते है और उसके बाद मिटटी की गणेश प्रतिमा को विसर्जित कर देते है.

ऐसी मान्यता है की ऐसा करने से गणेश जब जाते है तो घर के सभी संकट और समस्याएं अपने साथ ले जाते है. हालाँकि ये शिव पुराण में वर्णित व्रत भी है लेकिन महारास्त्र में ख़ास तौर पर लोकमान्य तिलक ने इसके महोत्सव की शुरुवात की ताकि लोग धार्मिक कारणों से जुटे और उनमे देश प्रेम की अलख जगाई जाए.

उनके इसी प्रयासों से देश की आजादी में काफी सहयोग मिला, अंग्रेज उन्हें भारतीय आजादी की लड़ाई का बाप यानी के भारत का बापू मानते थे. गाँधी जी भी उनके चेले थे और उनकी मौत पर 10 लाख लोग अंग्रेजो की गुलामी के समय में जुटे थे जो की एक रिकॉर्ड है.

अब जाने इसी समारोह के दौरान आने वाले एक और दिव्य व्रत और त्यौहार के बारे में...


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गणेश चतुर्थी के 3 दिन बाद दुर्वाष्टमी का त्यौहार आता है जिस दिन पार्वती की गोद में बैठे गणेश की पूजा दूर्वा से की जाती है. इतिहास के अनुसार, अनलासुर दैत्य अजेय था वो कैसे भी मर नहीं सकता था ऐसे में गणेश जी गए और उसे निगल गए, ऐसे वरदान के बावजूद वो मर गया लेकिन गणेश जी के पेट में अग्नि भड़क गई.

तब दुर्वासा ऋषि ने उन्हें एक घास खाने को कहा जिसे खाते ही उनके पेट की अग्नि शांत हो गई इसी दिन से उस घास का नाम दुर्वासा के नाम पर दूर्वा पड़ गया. इस दिन गणेश की पार्वती के गोद में बैठे स्वरुप की दूर्वा से पूजा कर एक समय खाकर उपवास करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते है.

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