ऋषि पंचमी : रजस्वला पत्नी द्वारा बनाया भोजन खिलाया ब्राह्मणो को तो अपने ही घर में कुत्तिया और बैल हुए दम्पति

"रजस्वला स्त्री से बात करना उसे देखना और छूना भी पापकारी है इसलिए इन तीन दिनों में महिलाये बेडरेस्ट ही करती है, लेकिन अगर वो घर की रसोई में घुसे तो समझो आपका...."

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गणेश चतुर्थी आते ही महारास्त्र में विशेष उत्साह छा जाता है लेकिन उसके ही एक दिन बाद आने वाले त्यौहार पर लोग कम ही ध्यान देते है. गणेश चतुर्थी के अगले ही दिन पड़ता है ऋषि पंचमी का त्यौहार (व्रत भी) जिसके मायने बहुत कम लोग ही जानते है, जाने आज उसके मायने.

ऋषि पंचमी असल में सप्तऋषियों का जन्मदिन यानि की बर्थडे है, ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की तो पहले सनत्कुमारो को बनाया लेकिन वो जन्म से ही सन्यासी हो गए. उसके बाद उन्होंने ऋषि पंचमी के दिन ही सप्तऋषियों को मानसिक रूप से जन्म दिया और ये दिन उनके लिए ही बनाया जाता है.

सनातन मान्यता है की परलोक में 7 स्वर्ग है और उन सभी में एक ऋषि गुरु के रूप में आसीन है जो की देवताओ के पितृ है और इसलिए इस दिन व्रत सहित अनुष्ठान करने से हमारे पूर्वजो की मुक्ति हो जाती है. हालाँकि लोग इसे औरतो के रजस्वला दोषो के निवारण के लिए करते है लेकिन असली कारण पितृ मुक्ति का ही है.

जाने इसके पीछे की कहानी और इसका प्रभाव....


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हालाँकि ये ऋषि पंचमी व्रत अनुष्ठान विशेष रूप से ब्राह्मणो के लिए है लेकिन अपने पितरो के लिए सभी कर सकते है. एक ब्राह्मण (सतयुग की कथा) हर ऋषि पंचमी के दिन श्राद्ध करता था ब्राह्मणो को खिलाकर दक्षिणा देता था, एक दिन जब वो ब्राह्मणो को घर से बाहर तक छोड़ लौटा तो एक कुटिया और बैल को बात करते सुनकर हतप्रद रह गए.

कुतिया बोल रही थी की एक सांप ब्राह्मणो के लिए बन रहे पकवानो में जहर छोड़ गया था जिसे में पि रही थी तो बहु ने मुझे मारा और बैल बोल रहा था की तुझे मारा सो तो ठीक लेकिन में तो इसका बाप था इसमें मुझे ऋषि पंचमी के दिन पानी तक नहीं पिलाया में प्यासा ही हूँ.


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ब्राह्मण अपने माता पिता की दुर्गति को देख रोने लगा और ऋषि वशिष्ट के पास गया और उनसे उनकी दुर्गति और मुक्ति का कारण पूछा. वशिष्ठ ऋषि ने कहा की तुम्हारे पिता भी ऋषि पंचमी को श्राद्ध करते थे लेकिन एक दिन तुम्हारी माँ रजस्वला थी तब उन्होंने भोजन बनाया और पिता ने जानबूझ कर वो ब्राह्मणो को खिला दिया था.

इसी पाप के फल से वो दोनों इस दुर्गति को प्राप्त हुए थे, तुम भी ऋषि पंचमी को श्राद्ध तो करते हो लेकिन व्रत नहीं करते हो. इस दिन एक वक्त सिर्फ चावल खाकर व्रत करना चाहिए और सुबह घर को गोबर से निप्कार उसपे कलश स्थापना कर के सप्तऋषियों का आह्वान करके उनकी पूजा करनी चाहिए.

उसके बाद ब्राह्मणो को भोज और दान दक्षिणा करानी चाहिए, पुत्र ने ऐसा ही किया और करते ही वो कुति और बैल मर गए और पुत्र को माता पिता के रूप में दर्शन देकर स्वर्ग सिधार गए. ऐसा है इस ऋषि पंचमी का प्रभाव क्योंकि सप्तऋषि ही सबके और सबसे बड़े पितृ है जिनकी संतुष्टि से पूर्वजो को सद्गति मिल जाती है.

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