जाने राजनैतिक पार्टियों की नींद उड़ाने वाले नोटा के बारे में मजेदार फैक्ट्स

"इस साल दहेज़ उत्पीड़न के मामलो में जाँच के बाद कार्यवाही का आदेश दिया था सुप्रीम कोर्ट ने कोई रिएक्शन नहीं हुआ लेकिन जब दलित संरक्षण कानून में ऐसा किया गया तो...."

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इस साल भारतीय उच्च न्यायालय में दो एक ही समान फैसले हुए लेकिन दोनों में से एक जबरदस्त राजनितिक मुद्दा बना तो दूसरे पर चर्चा ही नहीं हो रही है. दहेज़ प्रताड़ना के मामलो में पहले बिना जाँच FIR और गिरफ़्तारी होती थी जिसके चलते बहुओ का खौफ फ़ैल गया था समाज में, अब शादी के बाद ही अलग हो जाते है बेटा बहु.

इस साल न्यायालय ने इसे गलत बताते हुए इसमें बदलाव किया, लेकिन ऐसा ही कानून दलित संरक्षण कानून भी था जिसे भी न्यायालय ने 7 दिन की जांच के बाद FIR गिरफ़्तारी के साथ पलट कर फैसला किया. लेकिन चूँकि ससुराल वाले वोट बैंक नहीं और दलित राजनीती इस लोकसभा चुनाव में निर्णायक होगी तो इस बदलाव में जबरदस्त हिंसा और बहस हुई.

आखिरकार केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पल्टा और फिर से पहले वाली स्तिथि यथावत कर दी. लेकिन इससे हिंसक हो चूका दलित समाज तो शांत हो गया लेकिन अब स्वर्ण समाज में जातिवाद के चलते उबाल है, सोशल मीडिया के जरिये अब नोटा अभियान चला रहा है जिससे राजनैतिक पार्टिया सेहम गई है.

जाने आखिर क्या है ये नोटा और इसके चौंकाने वाले तथ्य भी...


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नोटा का अर्थ है नॉन ऑफ़ अबोव यानी जब जनता वोट डालने जाए तो उनके पास खड़े हुए प्रत्याशियों में से किसी को भी न चुनने का भी हक़ है. इससे पहले लोग या तो वोट ही नहीं देते थे या फिर निर्दलीय को वोट दे देते थे, हालाँकि नोटा से सिर्फ नकारात्मक चुनाव ही सामने आते है ये परिणाम को प्रभावित नहीं कर सकता है लेकिन जिसके वोट टूटे उसे तो चिंता होगी ही.

यूपीए 2 दे दौरान सरकार के पास नोटा का प्रावधान करने का सुझाव आया था लेकिन सरकार ने इसे खारिज कर दिया. तब सुप्रीम कोर्ट के जरिये इसकी समीक्षा की गई और अनंत कोर्ट के आदेश के बाद तत्कालीन सरकार को नोटा का प्रावधान करने की व्यवस्था करनी पड़ीं थी.


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नोटा को चुनाव आयोग में शुरू में घदे का चिन्ह दिया था जिसे बाद में बदल कर बैलट मशीन पर क्रॉस कर के दे दिया गया. कर्नाटक चुनाव में नोटा से कम से कम 15 सीटों पर चुनाव परिणाम प्रभावित हुए थे, इसी के भय से केरल पंचायत चुनाव में नोटा नहीं दिया गया था मतदाताओं को, राज्यसभा में भी नोटा था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब रोक दिया है.

नोटा में अभी और भी सुधार की जरुरत है तभी होगा ये कारगर नहीं तो सिर्फ वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने वाला ही होगा. जाने कुछ सुझाव.... सबसे ज्यादा नोटा वोट बढ़ने पर दुबारा चुनाव हो या कुछ निश्चित प्रतिशत से ज्यादा नोटा वोट होने पर दुबारा चुनाव हो. 

अगर नोटा के चलते दुबारा चुनाव  हुए तो दूसरे चुनाव में इसका विकल्प न हो, हारने वाले टॉप राजनैतिक दल चुनाव खर्च उठाये. नोटा से हारने वाले प्रतिभागी कुछ समय के लिए या आजीवन प्रतिबंधित हो चुनाव लड़ने से और सबसे बेहतर की के अगर जित के अंतर से ज्यादा हो नोटा वोट तो भी दुबारा हो चुनाव.

वैसे कई देशो में ये लागु हुआ तो बेन भी हो गया लेकिन भारत में अभी इस्पे शोध जारी है...

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