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गज और ग्राह ही मुक्ति पाकर बने थे वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय, जाने उनके पूर्व जन्म की कथा...

"भगवान् विष्णु के एक भक्त हाथी ने जिसे की अपना पूर्व जन्म याद था जब नदी में पानी पिने उतरा या कमल लेने उतरा तो एक ग्राह यानी की मगर ने उसका पेअर पकड़ लियत है पर.."
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image sources : hindpatrika

जब लंका पर स्वर्ण नगरी नहीं बनी थी तब भी वो मौजूद थी और उसे त्रिकूट पर्वत के नाम से जाना जाता था, उसी पर्वत के वन में एक श्वेत हाथी अपनी बहुत सी पत्नियों के साथ विचरता था. पूर्व जन्म के कर्मो के चलते उसे अपने पूर्व जन्म स्मरण थे इसलिए हाथी होते हुए भी वो भगवान् विष्णु का भक्त था और रोज पूजा अर्चना किया करता था.

एक दिन नदी में जल पिने गए हाथी को एक ग्राह (मगर) ने पकड़ लिया, दोनों बलवान थे और एक दूसरे को बारी बारी खींचने लगे. भागवत कथा के अनुसार ये कश्मकश हजारो सालो चली और जब हाथी तक गया और उसे अपनी मृत्यु निकट जान पड़ी तो उसने परमात्मा का स्मरण किया.

उसके आधे नाम लेते ही गरुड़ सवार विष्णु पहुंचे और सुदर्शन चक्र से ग्राह का मस्तक ही भेद दिया, तभी ग्राह एक दिव्य पुरुष बन गया और गज भी दिव्य पुरुष बन वैकुण्ठ चला गया. इस जन्म में जो कुछ भी होता है वो पूर्व जन्मो का फल ही हम भोगते है तो इन दोनों गज ग्रह का क्या भुत भविष्य था ये भी लिखा है स्कन्द पुराण में.

जाने दोनों की पूर्व और अगले जन्मो की भी कहानी....


image sources : isvaraforum

गज-ग्राह को अपनी भक्ति और विष्णु के हाथो मुक्ति के चलते वैकुण्ठ में स्थान मिला दोनों इस लोक में द्वारपाल हुए जिनका ही नाम जय और विजय हुआ. आगे सनत कुमारो के श्राप के चलते दोनों हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यपु, रावण-कुम्भकर्ण और शिशुपाल और दन्तवक्र हुए थे.

लेकिन गज और ग्राह कैसे बन गए दोनों ये भी जान ले...


image sources : wikipedia

ऋषि कपिल का नाम तो सबने सुन ही रखा है जिनके वंशज ऋषभ देव से जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था, वो कपिल मुनि महर्षि कर्दम के पुत्र थे. कर्दम ऋषि की पत्नी का नाम देवहुति था, उन्ही के गर्भ से कपिल मुनि जन्मे थे लेकिन उन्ही देवहुति को कर्दम जी से पहले और भी संताने थी.

उन्ही कर्दम और देवहुति के कपिल मुनि से दो बड़े पुत्र और थे जो की वेदज्ञ थे, एक बार एक राजा के यंहा यज्ञ संपन्न कर आये दोनों को जब धन मिला तो उसके लिए विवाद हो गया था दोनों में. तब दोनों ने एक दूसरे को ग्राह और गज होने का श्राप दे दियत है, दोनों विष्णु भक्त थे और दोनों की बात सच भी हुई.

लेकिन मौत से पहले उन्होंने तपस्या कर विष्णु जी को प्रसन्न कर लिया और वरदान में मुक्ति मांग ली और इसीलिए अगले जन्म में उन्हें पूर्व जन्म का स्मरण था और दोनों ने भगवान विष्णु के हाथो मुक्ति पाई. 

वैकुण्ठ में गया मनुष्य तब विष्णु ही बन जाता है जैसे भगवान् को भी वंहा श्राप लग सकता है तो वासियो को भी लग सकता है लेकिन अनंत वो वैकुण्ठ लौट ही आते है जबकि बाकि लोको में ऐसा नहीं है एक बार गिरा तो दूसरी बार आना तय नहीं है...
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