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एक ऐसा राजा जिसने किया गर्भधारण और जिसके बच्चे की माँ बने इंद्र देव..

"विज्ञानं के दौर में एक पुरुष द्वारा गर्भधारण करके अपनी संतान को जन्म देना संभव है लेकिन हजारो साल पहले एक राजा यवनाशक ने गर्भ धारण करके अपने पुत्र को जन्म"
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आज विज्ञान के इस दौर में किसी पुरुष द्वारा गर्भधारण करके स्वयं की संतान को जन्म देना संभव हो गया है लेकिन क्या आप यह जानते है की आज से कई हज़ारों वर्षो पहले हमारे पूर्वजों का ज्ञान, आज के ज्ञान की तुलना में बहुत ही उच्च था। विज्ञान चमत्कारों को देख कर हम आज आश्चर्यचकित हो जाते है ऐसे चमत्कार तो हमारे पूर्वज हज़ारों साल पहले कर चुके थे, जैसे पुरुष के द्वारा गर्भधारण करके संतान को जन्म देना।यह कहानी है

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राजा युवनाश्व की जिन्होंने स्वयं अपना गर्भधारण करके संतान को जन्म दिया था जो की बाद में “चक्रवती सम्राट राजा मांधाता” के नाम से प्रसिद्ध हुई।रामायण के बालकाण्ड के अनुसार ब्रह्माजी के पुत्र मरिचि के कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप के पुत्र हुए विवस्वान। और   विवस्वान के पुत्र थे वैवस्त मनु, मनु के दस पुत्रों में से एक का नाम था इक्ष्वांकु। इसी वंश में राजा युवनाश्व का जन्म हुआ था लेकिन उनके कोई पुत्र नहीं था।

पुत्र प्राप्ति की कामना लिए उन्होंने अपना सारा राज-पाठ ही त्याग दिया और वन में जाकर तपस्या करने लगे। वन में उनकी मुलाकात महर्षि भृगु के वंशज च्यवन ऋषि से हुई।च्यवन ऋषि ने युवनाश्व के लिए इष्टि यज्ञ करना प्रारम्भ किया ताकि जिससे राजा को संतान की प्राप्ति हो! यज्ञ के पूर्ण होने के बाद च्यवन ऋषि ने एक मटके में अभिमंत्रित किया हुआ जल रखा उस जल का सेवन राजा की पत्नी को करना था ताकि उसे संतान की प्राप्ति हो सके।

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इस यज्ञ में कई ऋषि-मुनियों ने भाग लिया था और यज्ञ के बाद सभी ऋषि-मुनि थकान की वजह से  गहरी नींद में सो गए। जब राजा युवनाश्व की नींद खुली तो उन्हे बहुत भयंकर प्यास लगी।राजा स्वयं उठे और इधर उधर पानी की तलाश करने लगे।राजा युवनाश्व को वह मटका दिखाई दिया जिसमें ऋषि ने अभिमंत्रित जल रखा था। राजा ने बिना सोचे समझे प्यास की वजह से उस सारे जल को पी लिया।

इस बात का पता जब ऋषि च्यवन को लगा तो ऋषि ने कहा की अब उनकी संतान उन्हीं के गर्भ से जन्म लेगी।और फिर संतान के जन्म का समय आया तब दैवीय चिकित्सकों, ने राजा युवनाश्व की कोख को चीरकर बच्चे को बाहर निकाला। बच्चे के जन्म के बाद यह समस्या उत्पन्न हो गई कि बच्चे की भूख कैसे मिटेगी सभी देवतागण भी वहां पर उपस्थित थे, इंद्र देव ने उस बच्चे की माँ की कमी को पूरा किया।

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इन्द्र देव ने अपनी अंगुली उस शिशु के मुंह में डाली जिससे  दूध निकल रहा था और कहा की “मम धाता” इसका मतलब है की मैं इसकी माता हूं।इस वजह से उस शिशु का नाम ममधाता पड़ा।इंद्र देव ने जैसे ही शिशु को अपनी अंगुली से दूध पिलाना शुरू किया वह शिशु 13 बित्ता बढ़ गया था। यह कहते हैं की राजा मांधाता ने सूर्य उदय से लेकर सूर्यास्त तक के सभी राज्यों पर धर्म के अनुकूल शासन किया था।

और इतना ही नहीं राजा मांधाता ने सौ अश्वमेघ, सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन जितने लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिए थे।इतने लम्बे समय तक धर्म के अनुकूल रहकर शासन करने के बाद राजा मांधाता ने विष्णु के दर्शनों के लिए वन में जाकर तपस्या करने का निर्णय लिए और विष्णु के दर्शन होने के बाद उसी वन में अपने प्राण त्याग कर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

article source: ajabgajab.com

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