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क्यों दुशासन हो गया था इतना क्रूर, मासिक धर्म के दौरान अपनी भाभी माँ को ही करने चला था नंगा

"द्वापर युग में जब धर्म के दो पाद होते है ऐसे समय भी कैसे दुशासन हो गया था इतना क्रूर के भरी सभा में अपनी रजस्वला भाभी माँ को ही करने चला था नंगी? जाने मूल भाव"
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image sources : storyteaser

सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी पर कालचक्र में सत, त्रेता, द्वापर और काली ये चार युग होते है जिसमे घटते हुए क्रम में धर्म के 4 स्तम्भ होते है. कलियुग में धर्म का सिर्फ एक स्तम्भ (दान) होता है और अब जब वर्तमान में इसके 5200 वर्ष बीत गए है तब भी ऐसी कोई घटना नहीं देखि होगी जब एक महिला को एक पुरुष भीड़ के बिच में नंगी कर रहा हो.

अब ये सोचिये की जब आज के युग में भी कोई अकेला पुरुष ऐसा दुस्साहस नहीं कर सक रहा है तो द्वापर में जंहा धर्म के 2 स्तम्भ होते है कैसे दुशासन ने ऐसी गन्दी हरकत की. वैसे रावण ने भी अपने भतीजे की होने वाली पत्नी (अप्सरा) का अपनी सेना के सामने बलात्कार किया था लेकिन वो अप्सरा थी उसकी बहु या भाभी माँ नहीं.

अब तो लोकतंत्र में प्रतिबंधित है लेकिन राजशाही में अगर कोई व्यक्ति अपने शरीर को बेच देता था (रुपयों के लिए या किसी और रकम के बदले जिसे हम बंधुआ मजदुर कहते है) तो वो खरीददार की सम्पति हो जाता था जैसे द्रौपदी को दुर्योधन ने मान लिया था जबकि वो हुई नहीं थी और फैले भ्रम के चलते दुशासन उसका कहा कर रहा था.

लेकिन फिर भी ऐसी क्रूरता आखिर दुशासन में आई कहा से थी, जाने???


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क्रूर कितना भी क्यों न हो लेकिन ऐसी निर्दयता किसी पुरुष में तब नहीं हो सकती थी, दुशासन की क्रूरता को जानने के लिए जाना होगा उसके लड़कपन में. शकुनि और कर्ण की संगत में बचपन से ही कौरव पांडवो से ईर्ष्या करने लगे थे इसी के चलते दोनों पक्षों के बच्चो में झगड़ा होता था जिसमे भीम अकेला ही सबको पिट देता था.

ऐसे ही एक झगडे में जब दुशासन अकेले ही भीम से भिड़ा तो वो अच्छी भली मार खाकर लौटा, उस दिन के बाद से अपने अनुज दुशासन को कभी भीम से सामना नहीं करने दिया था दुर्योधन ने. जब भी भीम उन्हें उकसाता और दुशासन लड़ने के लिए जाता तो दुर्योधन उसे रोक देता था.

इसी की वजह से धीरे धीरे दुशासन के मन में क्रोध पलने लगा और वो समझ गया की मेरा भाई मुझे कमजोर समझने लगा है और उसे अपनी मर्दानगी पर शक होने लगा...


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बचपन से पल रहा क्रोध और मर्दानगी की चोट उसे किसी बिच्छू की तरह डस रही थी, जब दुर्योधन ने उसे अरसे बाद मौका दिया अपनी मर्दानगी साबित करने का तो उसके अंदर का कुचला हुआ मर्द जाग उठा. उसे दब अपनी मर्दानगी का मौका मिल गया था भले ही एक अबला पर ही क्यों न हो.

क्रोध के इसी टूटे बाँध में उसने सभी मर्यादा तोड़ दी क्योंकि उसके मन में अहंकार हो गया था अपनी मर्दानगी का, लेकिन ठाकुर के दरबार में अहंकार तो पहले टूटते है. दुशासन ने द्रौपदी की साडी खींचनी प्रारम्भ की तो वो बढ़ने लगी, करीब 3 किलोमीटर खींचने के बाद वो बेहोश होकर गिर गया.

फिर उठा और ये क्रम 7 बार चला, 7 बार में 7 कोस यानी इक्कीस किलोमीटर साडी खींचने के बाद जब उसे चेत हुआ तो अपने स्थान पर आकर बैठ गया और किसी से नजर नहीं मिला पाया. इस चमत्कार को देख सभा में शांति हो गई और वंही सतगुनियो की आँखों से आंसू बह निकले थे.
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