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आज भी गांव में ब्याही गई लड़की बनती है किसी न किसी की धर्म पुत्री, जाने किसने शुरू की ये परंपरा

"रामायण किताबो में नहीं बल्कि हमारी परम्पराओ के जरिये हमारी रगो में दौड़ती है जो भी हम आज कुछ पूर्वजो के देखने से फॉलो करते है वो सब असल में रामायण की ही देन है.."
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image sources : patrika

शहरी लोग को परम्पराओ को कम जानते है लेकिन भारत ग्रामीण इलाको में बसता है और ग्रामीणों ने भी भारतीय संस्कृति को बचाये रखा है. शादी विवाह हो या घर में कोई भी संस्कार सभी गाँवों में ही देखने को मिलते है शहरो में नहीं, लेकिन कलियुग के 5200 साल पुरे हो जाने पर अब इन परम्पराओ का हम मतलब नहीं जानते है.

ज्यादातर धर्मगुरु भी पाखंडी ही बन गए है ऐसे में लोग उनसे भी दूर हो रहे है, जो सद्गुरु है वो चकाचौंध से ज्यादातर दूर ही रहते है (रामसुख दास जी)! ऐसे में इन परम्पराओ का मतलब अगर आपको जानना है तो गूगल गुरु पर ही सर्च करेंगे जिसमे आपको काफी काफी जानकारियों मिल जायेगी.

लेकिन ऐसा नहीं है की सब कुछ ही मिल जाएगा, अब ये सवाल जो हमने पूछा है क्या आप इसका उत्तर जानते है या फिर गूगल गुरु पे धुंध सकते है क्योंकि मिलने वाला नहीं है. सभी शास्त्रों ग्रंथो को पढ़ के समझने वाला ही इसका जवाब दे सकता है, हमारे समझे में जवाब आया है जो साझा कर रहे है.

जाने.....


image sources : indianexpress

किसी भी लड़की की शादी होती है तो वो अपने ससुराल चली जाती है लेकिन उसके पहले उसके घरवाले ससुराल को पूरी तरह जांच परख लेते है सब कुछ सही पाने अपर ही रिश्ते की बात आगे बढ़ाते है. शादी के ही दौरान लड़की को होने वाले ससुराल में की सम्मानजनक परिवार की धर्म बेटी (खोल्या देना) बनाया जाता है. 

ये परंपरा हम युगो युगो से निभाते आ रहे है लेकिन आखिर इसके पीछे तुक्क क्या है? असल में इसका कारण जुड़ा है रामायण से, रामायण में सीता जी को कुल की मर्यादा (राजधर्म) के चलते वनवास करना पड़ा था. तब वाल्मीकि जी ने उन्हें अपनी धर्म बेटी बनाकर आश्रय दिया था और सीता के सम्मान की रक्षा की थी.

इसी तर्ज पर तब से शादी के समय लड़की को ससुराल के गांव में किसी सम्माननीय घर की धर्म बेटी बनाया जाने लगा, ताकि कभी सीता के जैसे किसी बहु पर विपदा आये तो वो धर्म पिता बेटी को सम्हाल सके. आज तो यातायात और संचार के साधन हो गए है तो बेटी मायके से भी संपर्क कर सकती है जा सकती है लेकिन जब से ये प्रथा चल रही है तब ये साधन नहीं थे.

ऐसे में धर्म पिता या उसका परिवार बेटी के हितो की रक्षा करता था, हालाँकि लोग इस प्रथा का अर्थ भूल गए इसी के चलते लड़किया ससुराल में जलाई या प्रताड़ित की जाती रही थी! अगर धर्म पिता (परिवार) जो की गांव में ही रहता था अपनी जिम्मेदारी निभाता तो आज तलाक कानून और दहेज़ कानून की आवश्यकता ही नहीं होती.

बाकी ये परम्परा भी अब कुछ समाज ही निभा रहे है क्योंकि लोगो को इनका मतलब ही पता नहीं है...
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