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दाधीच ऋषि ने भगवान् विष्णु को दिया था ऐसा श्राप, जिसके चलते शर्मिंदा हो गए थे भगवान्

"ऋषि दाधीच का नाम तो आपने सुना होगा जिन्होंने अपनी अस्थिया देकर वृतासुर को मारने में देवताओ की मदद की थी लेकिन उसके पहले वो कहा थे क्या करते थे. जाने उनके कर्म.."
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image sources : totalbhakti

दाधीच ऋषि का नाम तो आपन सबने सुना ही होगा, आज अंगदान की मुहीम चल रही है तो उन्ही का उदाहरण देकर लोगो को प्रेरित किया जा रहा है. लेकिन उन्होंने तो अपने अंग नहीं बल्कि अस्थिया ही दान में दी थी, वो भी दुनिया की भलाई के लिए और देवताओ जैसे सत्पात्रों को किसी ऐसे गैरे को नहीं.

जिस स्थान पर दाधीच ऋषि तपस्या कर रहे थे और उन्होंने अपने शरीर को छोड़ दिया और अस्थिया दान दी वो जगह उत्तरप्रदेश के नैमिषारण्य तीर्थ के पास सीतापुर मिश्रिख में है. ऋषि के त्याग को तो आप जानते ही होंगे लेकिन उसके पहले और बाद में क्या हुआ था ये आप में से कम ही लोग जानते होंगे.

ऋषि ने जब अस्थिया दे दी तो उनके पीछे उनकी गर्भवती स्त्री स्वार्चा जो की तब जल लाने गई थी लौटी तो पति के पीछे सती होने को उद्धत हुई थी. परन्तु गर्भवती को सती होने की इजाजत नहीं शास्त्रों में तो उसने एक नुकीले पत्थर से अपना गर्भ फाड़ लिया और बच्चे को पिप्पल के वृक्ष के नीचे छोड़ कर सती हो गई.

वो ही बच्चा आगे जाकर पिप्पलाद हुआ, उसे पालने वाली दाधीच की बहन दधिमती के वंशज दायमा (धाय माँ) कहलाते है.


image sources : patrika

ये तो बाद का इतिहास हुआ लेकिन उसके पहले क्या? ऋषि दधीचि भृगुवंशी थे और शिव भक्त थे, उनके क्षुव नामक एक क्षत्रिय राजा मित्र था. एक दिन बात ही बात में दोनों में एक दूसरे के वर्ण की श्रेस्थता की बहस हो गई जिसमे क्षुव क्रोधित होकर दाधीच को पीटने लगे और हड्डिया तोड़ कर वंही छोड़ गए.

तब भगवान् शिव की उसने आराधना की तो शिव ने दर्शन देकर उसे ठीक कर दिया और उनकी हड्ड़ियो को अतुलित बना दिया (इसी के चलते वो हड्डियों से वज्र बना). तब दाधीच ने क्षुव को हरा दिया, क्षुव वैष्णव था और विष्णु जी की तपस्या करने लगा सिर्फ बदले की भावना से.

भगवान् प्रकट हुए तो उसने ब्राह्मणो पर क्षत्रियो की श्रेस्थता दाधीच के मुख से कहलवाने का वरदान माँगा, तब भगवान् विष्णु ने कहा की श्रेष्ठ तो ब्राह्मण ही है और मेरे इष्ट भी. लेकिन तुमने तपस्या कर वरदान के रूप मे ये बात मांग ली तो में भक्त वत्सल होने के चलते प्रयास जरूर करूँगा जो की भविष्य में मेरी बेइज्जती का कारण बनेगा.


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तब भगवान् विष्णु ब्राह्मण वेश में याचक बन कर गए और वरदान मांगने लगे लेकिन दाधीच ऋषि अपने तपोबल से उन्हें पहचान गए और क्रुद्ध हो गए. उन्होंने तब विष्णु जी को श्राप दिया की भविष्य में तुम कभी एक साधारण से गण से भी हार कर लज्जित होवोगे.

इसी श्राप के चलते दक्ष यज्ञ विध्वंश में जजमान होकर भी विष्णु जी वीरभद्र से नहीं जित पाए और वंहा से दौड़ना पड़ा था उन्हें. लेकिन इसमें उनकी भक्त वत्सलता थी न की को छोटे बड़े का स्वार्थ, ब्राह्मण के श्राप को अगर स्वीकार न करे तो ब्राह्मण का तेज नष्ट हो जाता ये भी उनका एक बड़प्पन ही था.
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