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सभी व्रतों में जल पीना वर्जित होता है, निर्जला एकादशी का सही नाम है भीम द्वादशी! जाने

"ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को आम भाषा में आजकल निर्जला एकादशी कहते है लेकिन असल में सभी व्रतों में जल पीना वर्जित है मतलब पिने से व्रत खंडित हो जाता है"
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हर वर्ष भारतीय पंचांग के ज्येष्ठ महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के रूप में मनाया जाता है या उपवास रखा जाता है. ऐसी मान्यता है की इस दिन की एकादशी में जल नहीं पीया जाता है, एक तो प्रचंड गर्मी और ऊपर से पानी भी न पिए तो कैसी हालत होगी.

इस एकादशी का महत्त्व तब बढ़ जाता है जब पुरे साल एकादशी न करने वाले (23 या 25 * अधिकमास में) अगर ये एकादशी भी कर ले तो भी उनको उतना ही पुण्य मिलता है जितना की सालभर करने वाले को. महाभारत में लिखा है एक ऐसा ही प्रसंग जिसके चलते ये एकादशी कहलाती है भीम एकादशी/द्वादशी.

दरअसल भीम से भूख बर्दाश्त नहीं होती थी और वो कोई व्रत उपवास नहीं करता था जबकि बाकी सभी पांडव एकादशी व्रत करते थे. ऐसे में एक दिन भीम ने भगवान् कृष्ण से ऐसा कोई सरल उपाय पूछा जिसके चलते उसे भी उतना ही पुण्य मिल जाए जो सालभर एकादशी करने से मिलता है.

तब कृष्ण ने बताई भीम को इस व्रत की विधि...


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भीम के पूछने पर भगवान् कृष्ण ने कहा था की ज्येष्ठ मास जो की सबसे गरम होता है उसमे अगर शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत रखा जाए. रात में मण्ड बनाकर उसमे एक घड़ा स्थापित किया जाए जिसमे मुंग के दाने जितना छेड़ करे उसमे पानी रखे और रातभर उसकी जलधार पाने पर गिरने दे और सोये नहीं.

उभर स्नान कर के ब्राह्मणो को भोजन कराकर के दोपहर बाद में भोजन कर व्रत खोले ऐसे किये गए एकादशी व्रत से सभी 24 एकादशियो का फल मिलता है. इसे निर्जला एकादशी पता नहीं किसने नाम दिया क्योंकि सभी एकादशियो में या सभी व्रतों में जल नहीं पीया जाता है.

दिन में सोने से, शहद खाने से (अन्न तो सर्वथा वर्जित है) और एक बार से ज्यादा पानी पिने से कोई भी व्रत हो वो टूट जाता है. हालाँकि अब लोगो में शक्ति नहीं इसलिए वो श्रद्धा के अनुसार अपने शरीर को ध्यान में रखते हुए जैसा होता है वैसा व्रत करते है लेकिन बाकि तीन युगो में ऐसा नहीं होता था.

शायद निर्जला में एक बार भी जल नहीं पिया जाता होगा इसके चलते इसे निर्जला कहा जाता है, लेकिन सामर्थ्य (शरीर में) तभी व्रत करे. एकादशी के दिन अन्न न खाये बस, फलाहार चाहे जीतनी बार करे कोई मनाही नहीं है क्योंकि भूखे मरने से पाप लगता है सेहन हो जाए तो पाप नहीं लगता है.
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