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21 बार क्षत्रियो के संहार के पाप से मुक्त करने के लिए ही हुआ था गणेश-परशुराम युद्ध!

"पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय शून्य करने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन तब वो उसे पूरी करने में समर्थ नहीं थे इसलिए उन्होंने इसके लिए बारी बारी से महादेव समेत कई देवो की"
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image sources: hindupad

सेक्युलर ये कह के सनातन धर्म पर ताना कस्ते है की ये कैसा धर्म जिसमे भगवान् ही भगवान् से लड़ते है? ठीक है उनका कथन जरूर सत्य है लेकिन परमात्मा के हर एक्टिंग के पीछे कोई न कोई रिएक्शन होता है, महाभारत में कृष्ण और शिव परिवार का युद्ध इसलिए हुआ था क्योंकि शिव जी ने बाणासुर को अभय दे रखा था अनंत वो जगन्माता के हाथो ही मारा गया था.

ऐसे ही शिव और विष्णु के बिच भी एक युद्ध की कथा है जो की दोनों के भक्तो के अहम् के चक्कर में दोनों को करना पड़ा था बाद में भक्तो ने ही अपने घमंड को जान उन्हें रोका था. ऐसे ही वीरभद्र (शिव के गण) और विष्णु जी के युद्ध की भी कथा है जिसमे दाधीच ऋषि के श्राप के चलते हारे थे भगवान् विष्णु.

ऐसा ही एक युद्ध हुआ था जो था भगवान् विष्णु के 6टे अवतार परशुराम जी और शिव पुत्र गणेश के बिच जिसमे कहा जाता है की गणेश जी एकदन्त हो गए थे. लेकिन ये युद्ध जैसा समझ आ रहा है सभी को वैसा था नहीं, असल में इसका उद्देश्य परशुराम जी को 21 बार क्षत्रियो के वंश विनाश के पाप से बचाना था.

जाने इस युद्ध के पीछे की असली वजह...


image sources: Deviantart

सहस्त्र बाहु द्वारा पिता जमदग्नि के वध के बाद क्षत्रियो को 21 बार समूल नाश करने की प्रतिज्ञा तो कर ली परशुराम जी ने लेकिन वो बिना देवकृपा के असम्भव थी. इसके लिए परशुराम जी ने शिव जी की शरण ली (तब गणेश नहीं जन्मे थे) और उनसे वरदान में अश्त्र शस्त्र पाए लेकिन क्षत्रिय की इष्ट माँ शक्ति ने इसका विरोध किया तो परशुराम जी रोने लगे तब सती ने आज्ञा दी.

एक एक करके परशुराम जी ने 21 बार क्षत्रियो का विनाश किया, यंहा तक के गर्भस्थ शिशुओं को भी नहीं छोड़ा! अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर उन्होंने कुरुक्षेत्र में लहू से बने सरोवरों से पितरो का तर्पण किया और उनसे कुरुक्षेत्र को तीर्थ बनाने और पाप नाश करने का वरदान प्राप्त किया.

उसी वरदान को पूर्ण करने में हेतु बने थे गणेश जी, युद्ध के दौरान गणेश जी ने अपनी सूंड में पकड़ कर परशुराम को वैकुण्ठ गोलोक समेत सभी धामों का दर्शन करवाया और परिक्रमा भी करवाई जिसके चलते उनके पाप धूल गए. परशुराम जी इस बात को समझ नहीं पाए और उन्होंने गणेश जी को एक दन्त बना दिया.

बाद में उन्होंने क्षमा मांगी और तब सब ठीक हो गया, पद्म पुराण के गणपति खंड में है वर्णन इस अद्भुद कथा का.
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