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चित्रकूट में जंहा भरत मिलाप हुआ था, वंहा राम जी की पहनी पादुका के निशान आज भी मौजूद है!

"अयोध्या पहुँच कर राम जी को वनवास हुआ ये सुनकर ही भरत मूर्छित हो गए थे, सब उन्हें शक की नजरो से देख रहे थे ये जानकार भरत ने राम जी का वन में ही राज्याभिषेक कर..."
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                                                     चित्रकूट में मौजूद राम जी के चरण पादुका चिन्ह 
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"अयोध्या पहुँच कर राम जी को वनवास हुआ ये सुनकर ही भरत मूर्छित हो गए थे..." आज अगर किसी छोटे बेटे को पिता बड़े बेटे को बेदखल कर पुरु सम्पति दे दे तो वो इसे सहर्ष स्वीकार कर लेगा. लेकिन भाई भरत का प्रताप देखिये की उन्होंने भाई के लिए अयोध्या के राज सिंघासन को भी लात मार दी थी.

कैकेयी के पिता अश्वपति को कोई पुत्र नहीं था इसलिए उनका भांजे भरत पर विशेष प्रेम था, जब राम जी का राज्याभिषेक होना था तब भरत अपने ननिहाल ही था. दशरथ जी को ये डर था के कंही न कंही कोई बाधा आ सकती है इसलिए उन्होंने जल्दबाजी में राम जी का राज्याभिषेक रखा भरत को भी नहीं बुला सके थे.

राम जी को वनवास और दशरथ जी की मौत की सुचना मिलने से पहले ही भरत को स्वप्न में ऐसे लक्षण दिख गए थे जो किसी अनिष्ट की तरफ इशारा कर रहे थे. जब वो अयोध्या पहुंचे तो अकेले ही रथ दौड़ा कर जल्दी पहुंचे तो देखा की पूरी अयोध्या विधवा की तरह श्रीहीन हो गई है.

माँ से पिता की मौत की खबर सुन वो मूर्छित हो गए थे लेकिन जब पुनः भाई राम के वनवास की खबर मिली तो वो फिर से मूर्छित हो गए थे... जाने ऐसे भरत की महिमा बखान करने वाले चित्रकूट प्रसंग का पहले न सूना गया वृतांत ..

                                                        वो स्थान जंहा हुआ था भरत मिलाप 
image sources: Tripadvisor

ननिहाल से लौटे भारत की तरफ सब ऐसे शक की नजरो से देख रहे थे मानो भरत ने राम जी का वन में भेजा हो. भरत ये सहन न कर सकते और अयोध्या दरबार में घोषणा की के वो कभी राजगद्दी पर नहीं बैठेंगे, हमेशा बड़ा भाई ही इस्पे बैठता आया है साथ ही उन्होंने कहा की वन में ही राम जी का राज्याभिषेक होगा जिसके बाद दरबार में साधू साधू की ध्वनि गूंज उठी!

भरत राम जी के पास पहुंचे दंडवत प्रणाम किया और राम जी से वापस लौट चलते की विनती की, राम जी कहा मानने वाले थे तो भरत वंही धरने (मांग न पूरी होने तक भूखे रह कर जान देना) पर बैठ गए. तब राम जी ने भरत से कहा, भाई मैंने तुम्हारा क्या अहित किया है जो तुम मेरे धर्म के बिच में आ रहे हो!


image sources: Uttarpradesh

तब भी भरत नहीं माने तो राम जी ने भरत से ही कहा, ठीक है मैं अपना धर्म तुम्हे सौंपता हूँ तुम जो कहोगे में वो ही करूँगा तुम अनशन त्याग दो तब भरत उठे और उस सभा को सम्बोधित करते हुए कहा, "मैं स्वार्थी हूँ, सब राम जी के वनवास का कारण मुझे समझ रहे थे इसलिए अपने इस कलंक को धोने के लिए ही में सबको यंहा चित्रकूट ले आया हुआ! 

असल में जो भैया राम कर रहे है वो ही धर्म है में भी उनके स्थान पर होता तो ये ही करता (वनवास ही जाता) इस धर्म से पीछे नहीं हटता! जब राम जी ने अपना धर्म ही मुझे सौंप दिया है तो में अब अनीति नहीं कर सकता और उन्हें लौटने के लिए नहीं कह सकता हूँ लेकिन मैं राज सिंघासन पे नहीं बैठूंगा, भैया मुझे अपनी पादुकाएं दे वो ही अयोध्या पर राज करेगी! 

में भी 14 वर्षो तक सरयू के किनारे वल्कल धारण कर सिर्फ गौमूत्र में बने जौ के दलिये पर ही जीवित रहूँगा और न्याय पूर्ण शासन करूँगा अगर 14 वर्ष पुरे होते ही राम जी नहीं लौटे तो में भी आत्मदाह कर लूंगा, इतना कह कर भरत रोने लगे और राम जी के चरणों में गिर पड़े......

ऐसा था भाई भरत का अनुपम त्याग, इसलिए राम जी ने हनुमान जी को आगे जाकर भरत को रोकने को कहा था!
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