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होइ वही जो राम रची रखा :रामायण की वो घटनाएं जो साबित करती है के रावण का मरना पहले से तय था...

"अगर आपको ये लगता है की आप अपनों के लिए या दुसरो के लिए कुछ कर रहे है तो ये आपका वेहम है, पैदा होने के साथ ही आपकी तक़दीर तय हो जाती है. रामायण की कुछ घटनाये भी "
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भले ही लोग पुरुषार्थ करने की बातें कहते है लेकिन अपने महसूस किया होगा की जो आपके पास है या जो आपने पाया है वो सभी आपको भाग्य के बल पे ही मिला है. हालाँकि मनुष्य को करने योग्य कर्म तो मरतेदम तक करना चाहिए लेकिन उसके पास जो साधन है वो भाग्य से ही मिलते है न की किसी के कुछ करने से.

जन्म के साथ ही आपकी तक़दीर में काफी कुछ तय हो गया होता है, आपके हाथ में बस ये ही है की जो भी आप काम कर रहे है उनमे आप बुद्धि का इस्तेमाल कर पाप से बचे और पुण्य करते रहे. लेकिन पुण्य भी फल की आशा से नहीं कर्तव्य समझ कर करे तब भी अच्छा है.

भगवान् भी जब धरती पर जन्म लेते है तो उनके साथ ही क्या क्या होना है वो पहले से ही तय हो गया होता है, रामायण में भी रावण का मरना पहले से तय था. वाल्मीकि जी ने तो रामायण घटित होने से पहले ही लिख दी थी, इसी के चलते उनकी और तुलसीदास रामायण में कुछ विरोधाभास है.

जाने रामायण में घटी कुछ ऐसी ही घटनाएं जो ये साबित करते है की जो हुआ वो पहले से ही तय था...


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समुन्द्र लांघ कर जब हनुमान ने लंका में प्रवेश किया तो मच्छर जितना रूप धारण कर रखा था इस्पे भी लंका की पहरे दार लंकिनी ने उन्हें पकड़ लिया. तब हनुमान ने उसके ऊपर मुक्के से प्रहार कर दिया जिससे उसे खून की उल्टिया होने लगी, इस्पे उसे वो बात याद आ गई जब रावण को वरदान देकर जाते हुए ब्रह्मा जी ने उनसे कही थी.

"जब रावनहि ब्रह्मा वर दीन्हा, चालत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा! विकल होसी ते कपि के मारे तब जनेऊ निशिचर संघारे" अर्थात ब्रह्मा जी ने उससे तब कहा था की जब एक वानर के मारने से तुम्हे खून की उल्टिया हो और तुम विचलित हो जाओ तो समझ लेना की रावण का अंत निकट है.

तब लंकिनी ने ससम्मान हनुमान जी को लंका में प्रवेश कराया और शुभकामनाये दी...


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इंद्र को ये कह के नारद जी ने संतोष दिया था की दशरथ नंदन राम जी ही भगवान् विष्णु के अवतार है और वो ही रावण का वध कर तुम्हे फिर से स्वर्ग का अधिपति बनाएंगे. लेकिन जब राम जी का राजकुमार पद पर अभिषेक होने वाला था तो इंद्र फिर भी विचलित हो गया. 

अनंत सरस्वती कैकयी की जिव्हा पर बैठी और उन्होंने वो वर मांग लिए जिससे इंद्र का काम बन गया, हालाँकि कैकयी जी ऐसा कभी नहीं कहती लेकिन ये तो देव भी विपरीत हो गए थे. दशरथ जी ने राम जी से कहा की मुझे कैद में डाल तो लेकिन वन में न जाओ लक्ष्मण ने भी ये ही बात कही लेकिन राम जी ने कहा की देव ये ही चाहते है और ये ही मैं करूँगा.


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विभीषण की बेटी त्रिजटा सीता जी की प्रमुख परिचारिका थी, जब रावण के कहले पर बाकि राक्षसिया सीता जी को डरा धमका रही थी तो उसने कहा की मैंने आज सुबह भोर में एक सपना देखा जिसमे एक वानर पूरी लंका को जलाकर ख़ाक कर रहा है और उसे कोई रोक नहीं पा रहा है.

रावण के दस शीश और बिस भुजाये कट चुकी है और वो घड़े पर बैठे दक्षिण दिशा की और जा रहा है (दक्षिण में नरक होता है), में सभी से कह रही हु की ये बात 4 दिन के भीतर ही सत्य होगी. ये सुनकर सभी राक्षसिया डर गई और सीता जी से क्षमा याचना करने लगी.


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गर्भवती होने के लक्षण दिखाई देने पर राम जी सीता जी से वर मांगने बोलै तो उन्होंने वनवास ही मांग लिया था, दरअसल वो राजा राम की मज़बूरी समझ गई थी. प्रजा में से सिर्फ एक धोबी ने ही हालाँकि उनपे अंगुली उठाई थी लेकिन लोकतंत्र में तब ये भी गंवारा नहीं था.

ऐसे में सीता जी ने अपने पति के धर्म की लाज रखने के लिए उस वरदान का उपयोग किया था, लक्षमण सीता जी को छोड़ने गए और जब उन्हें मालूम हुआ की वो अब वापस नहीं लौटेगी तो वो रोने लगे और लौटते समय बेहोश हो गए. तब उनके साथ रथ पर बैठे सुरथ ने उनसे पूछा के सीता जी को छोड़ आये, जिसे सुन लक्ष्मण को आश्चर्य हुआ.

सुरथ ने तब कहा की दशरथ जी को दुर्वासा ऋषि ने पहले ही ये सब कह दिया है जो आज बीत रहा है, तुम शोक न करो लक्ष्मण क्योंकि "होय वही जो राम रची रखा..."
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